श्रीमद्भगवद्गीता ११.१५ — पश्यामि देवांस्तव देव देहे
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✦ अर्थ
दिव्यचक्षु प्राप्त होने पर अर्जुन श्रीकृष्ण के अति विस्मयकारी विश्वरूप का वर्णन आरम्भ करते हैं। अपने वर्णन के इस प्रथम श्लोक में वे भगवान के शरीर में समस्त देवताओं, सभी प्रकार के प्राणियों, कमल पर विराजमान ब्रह्मा, शिव, ऋषियों और दिव्य सर्पों को देखते हैं। यह दर्शन प्रकट करता है कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड और उसके समस्त देवता एक ही परम पुरुष में निवास करते हैं।
उत्पत्ति और कथा
Bhagavad Gita Chapter 11, Verse 15 · Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva) · Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)
ग्यारहवें अध्याय विश्वरूप दर्शन योग में, श्रीकृष्ण द्वारा दिव्यचक्षु प्रदान किए जाने पर अर्जुन विश्वरूप को देखना और उसका वर्णन करना आरम्भ करते हैं। यह श्लोक उनके वर्णन का आरम्भ है, जिसमें वे भगवान के शरीर में समस्त देवताओं, प्राणियों, ब्रह्मा, शिव, ऋषियों और दिव्य सर्पों को विद्यमान देखते हैं।
✦ शास्त्रों में वर्णित
कहा जाता है कि विश्वरूप के भीतर अर्जुन ने समस्त सृष्टि को -- प्रत्येक लोक, देवता और प्राणी को -- भगवान के एक ही शरीर में एकत्र देखा, जो दर्शन केवल दिव्य कृपा से ही सम्भव है और जो ईश्वर के सचमुच अनन्त स्वरूप की झलक प्रदान करता है।
मंत्र
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अर्जुन उवाच पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान्। ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थ मृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान्॥
arjuna uvācha paśhyāmi devāns tava deva dehe sarvāns tathā bhūta-viśheṣha-saṅghān brahmāṇam īśhaṁ kamalāsana-stham ṛiṣhīnśh cha sarvān uragānśh cha divyān
अर्थ:अर्जुन ने कहा -- हे देव! मैं आपके शरीर में समस्त देवताओं को तथा भाँति-भाँति के प्राणियों के समूहों को देख रहा हूँ; कमल के आसन पर विराजमान ब्रह्मा, भगवान शिव, समस्त ऋषियों और दिव्य सर्पों को भी देख रहा हूँ।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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श्रीमद्भगवद्गीता ११.१५ — पश्यामि देवांस्तव देव देहे पाठ के लाभ
भगवान के विश्वरूप के विस्मयकारी वर्णन का शुभारम्भ करता है
प्रकट करता है कि समस्त देवता और प्राणी एक ही परम पुरुष में निवास करते हैं
भक्त की दृष्टि को विस्तृत कर ईश्वर को सर्वव्यापक रूप में दिखाता है
श्रीकृष्ण की लौकिक महिमा के प्रति विस्मय और श्रद्धा जगाता है
यह समझ विकसित करता है कि सम्पूर्ण सृष्टि दिव्य है
परमात्मा की विशालता के चिन्तन हेतु एक प्रभावशाली श्लोक
श्रीमद्भगवद्गीता ११.१५ — पश्यामि देवांस्तव देव देहे जप विधि
इस श्लोक का पाठ ग्यारहवें अध्याय में प्रकट विश्वरूप का चिन्तन करते हुए करें। उच्चारण करते समय सृष्टि के समस्त देवताओं, ऋषियों और प्राणियों को भगवान के शरीर में समाहित देखें। इस दर्शन को अपने भीतर परमात्मा की भावना को किसी एक रूप से परे विस्तृत करने दें, और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को अपने में धारण करने वाले एक परम पुरुष के प्रति विस्मय और भक्ति जागृत करें।
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