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श्रीमद्भगवद्गीता १८.६८ — य इमं परमं गुह्यम्

🕉️ hindu·📿 11× जप·🕐 सहसाधकों के साथ गीता का उपदेश, सहभाजन या चर्चा करने से पूर्व·📜 Bhagavad Gita Chapter 18, Verse 68

अन्य नाम / खोज: ya idam paramam guhyam · mad bhakteshu abhidhasyati · bhagavad gita 18.68 · gita 18 68 · teaching the gita to devotees · mam evaishyaty asanshayah

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अर्थ

गीता के समापन की ओर बढ़ते हुए श्रीकृष्ण उनकी प्रशंसा करते हैं जो इस ज्ञान को बाँटते हैं। वे घोषित करते हैं कि जो कोई उनमें परम भक्ति रखकर इस परम गुह्य ज्ञान का उपदेश उनके भक्तों को देता है, वह नि:सन्देह उन्हें ही प्राप्त करता है। यह श्लोक, जो गीता के अपने माहात्म्य का अंग है, प्रकट करता है कि प्रेमपूर्वक गीता का उपदेश सहभक्तों को देना एक उच्च भक्ति-कर्म है जो सीधे भगवान तक ले जाता है।

उत्पत्ति और कथा

Bhagavad Gita Chapter 18, Verse 68 · Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva) · Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)

अठारहवें अध्याय, मोक्ष-संन्यास-योग के समापन भाग में, अपना परम उपदेश देने के पश्चात श्रीकृष्ण गीता की और उससे जुड़ने वालों की महिमा गाते हैं। यहाँ, गीता के माहात्म्य से सम्बद्ध एक श्लोक में, वे वचन देते हैं कि जो इस परम गुह्य ज्ञान का उपदेश उनके भक्तों को परम भक्ति के साथ देता है, वह निश्चय ही उन्हें प्राप्त करेगा।

शास्त्रों में वर्णित

ऐसा माना जाता है कि जो निष्काम भाव से गीता का ज्ञान बाँटते हैं वे भगवान और मानवता की महान सेवा करते हैं, और यहाँ श्रीकृष्ण का अपना वचन ऐसे भक्त उपदेशकों को नि:सन्देह उन्हें प्राप्त करने का आश्वासन देता है।

मंत्र

किसी भी पंक्ति या ▶ बटन पर टैप कर सुनें

इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति।भक्ितं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः॥

ya idaṁ paramaṁ guhyaṁ mad-bhakteṣhv abhidhāsyati bhaktiṁ mayi parāṁ kṛitvā mām evaiṣhyaty asanśhayaḥ

अर्थ:जो पुरुष मुझमें परम भक्ति करके इस परम गुह्य ज्ञान का उपदेश मेरे भक्तों को देता है, वह नि:सन्देह मुझे ही प्राप्त होता है।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

यः🔊yaḥजो
इमम्🔊idamइस
परमं गुह्यम्🔊paramaṁ guhyamपरम गुह्य; सर्वाधिक गोपनीय ज्ञान
मद्भक्तेषु🔊mad-bhakteṣhuमेरे भक्तों में
अभिधास्यति🔊abhidhāsyatiउपदेश देगा; सिखाएगा
भक्तिम्🔊bhaktimभक्ति; प्रेमपूर्ण सेवा
मयि🔊mayiमुझमें
पराम्🔊parāmपरम; दिव्य
कृत्वा🔊kṛitvāकरके; प्रदान करके
माम् एव🔊mām evaमुझे ही; निश्चय ही मुझको
एष्यति🔊eṣhyatiप्राप्त होता है; आता है
असंशयः🔊asanśhayaḥनि:सन्देह; निःसंशय

श्रीमद्भगवद्गीता १८.६८ — य इमं परमं गुह्यम् पाठ के लाभ

पवित्र ज्ञान बाँटने को परम भक्ति-कर्म के रूप में महिमामंडित करता है

वचन देता है कि जो गीता को प्रेमपूर्वक सिखाता है वह भगवान को प्राप्त करता है

सहभक्तों के बीच आध्यात्मिक ज्ञान फैलाने को प्रोत्साहित करता है

पुष्टि करता है कि भक्ति से किया गया निष्काम उपदेश भगवान को प्रिय है

गीता के अपने आत्म-माहात्म्य (गीता माहात्म्य) का अंग है

दूसरों के साथ भगवान का सन्देश बाँटकर सेवा के लिए प्रेरित करता है

श्रीमद्भगवद्गीता १८.६८ — य इमं परमं गुह्यम् जप विधि

जप संख्या11बार
उत्तम समयसहसाधकों के साथ गीता का उपदेश, सहभाजन या चर्चा करने से पूर्व

इस श्लोक का पाठ गीता के उपदेश को दूसरों के साथ बाँटने से पूर्व करें, इस कर्म को भगवान के प्रति परम भक्ति के रूप में अपनाते हुए। पाठ करते समय पवित्र ज्ञान को निष्काम और प्रेमपूर्वक सहभक्तों को देने का संकल्प लें, श्रीकृष्ण के इस वचन पर विश्वास रखते हुए कि ऐसी सेवा नि:सन्देह उन तक ले जाती है। सत्संग आरम्भ करते समय अथवा शास्त्र का कोई भी उपदेश देते समय इसका पाठ उपयुक्त है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्रीकृष्ण वचन देते हैं कि जो कोई उनमें परम भक्ति रखकर गीता के इस परम गुह्य ज्ञान का उपदेश उनके भक्तों को देता है, वह नि:सन्देह उन्हें ही प्राप्त होता है। इस प्रकार भक्ति में गीता का ज्ञान बाँटना सीधे भगवान तक पहुँचने का मार्ग है।
यह श्लोक बल देता है कि इसे परम भक्ति के साथ ('भक्तिं मयि परां कृत्वा') सिखाना चाहिए और भगवान के भक्तों के बीच बाँटना चाहिए। भक्ति का भाव और श्रोताओं की उपयुक्तता दोनों महत्त्वपूर्ण हैं, जिससे पवित्र ज्ञान श्रद्धापूर्वक दिया जाए।
भगवान के अपने उपदेश को प्रेमपूर्वक सहभक्तों के साथ बाँटकर मनुष्य भगवान और दूसरों के आध्यात्मिक कल्याण दोनों की सेवा करता है। श्रीकृष्ण उनके सन्देश को फैलाने की इस निष्काम सेवा को परम भक्ति गिनते हैं, जो उपदेशक को उन तक ले जाती है।
ये समापन श्लोक स्वयं गीता और उसके साथ जुड़ने के पुण्य की महिमा गाते हैं। यह श्लोक उन लोगों के लिए विशेष आशीर्वाद को उजागर करता है जो इसे भक्ति में सिखाते हैं, जो गीता के आत्म-माहात्म्य का अंग बनकर अध्ययन और सहभाजन को प्रोत्साहित करता है।

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