श्रीमद्भगवद्गीता ४.१० — वीतरागभयक्रोधा
अन्य नाम / खोज: vita raga bhaya krodha · vita-raga-bhaya-krodha man-maya mam upashritah · bhagavad gita 4.10 · gita 4 10 · free from attachment fear anger gita · taking refuge in krishna gita
अपनी भाषा/लिपि में पढ़ें
✦ अर्थ
ज्ञान-कर्म-संन्यास योग अध्याय के इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि युगों-युगों में असंख्य साधक उन्हें कैसे प्राप्त हुए हैं। जिस मार्ग का वे उल्लेख करते हैं वह दो प्रकार का है — आन्तरिक शुद्धि, अर्थात् राग, भय और क्रोध से मुक्ति, तथा पूर्ण शरणागति के द्वारा भगवान में प्रेमपूर्ण तन्मयता। यथार्थ ज्ञान की अग्नि से पवित्र होकर ऐसे अनेक भक्त पहले ही उनके दिव्य स्वरूप को प्राप्त कर चुके हैं, जो दर्शाता है कि ईश्वर-प्राप्ति का लक्ष्य वास्तविक और प्राप्य है।
उत्पत्ति और कथा
Bhagavad Gita Chapter 4, Verse 10 · Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva) · Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)
चौथे अध्याय, ज्ञान-कर्म-संन्यास योग में, अपने जन्म और कर्मों के दिव्य स्वरूप को प्रकट करने के बाद, भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि भक्त उन्हें कैसे प्राप्त होते हैं। वे कहते हैं कि युगों-युगों में अनेक पुरुष, राग, भय और क्रोध से मुक्त होकर तथा उनकी शरण लेकर, ज्ञान से पवित्र हुए और उनके ही स्वरूप को प्राप्त हुए — अर्जुन को आश्वस्त करते हुए कि उन तक पहुँचने का मार्ग सभी के लिए खुला है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
असंख्य संतों का जीवन इस श्लोक का जीवंत प्रमाण है, क्योंकि जिन अनेकों ने भगवान की शरण ली और राग, भय एवं क्रोध पर विजय पाई, वे ज्ञान की अग्नि से रूपान्तरित हो गए और परम्परा के अनुसार उनके दिव्य स्वरूप में लीन हो गए — एक ऐसा वचन जिसे गीता घोषित करती है कि असंख्य भक्तों के लिए पहले ही पूर्ण हो चुका है।
मंत्र
किसी भी पंक्ति या ▶ बटन पर टैप कर सुनें
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः। बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः॥
vīta-rāga-bhaya-krodhā man-mayā mām upāśhritāḥ bahavo jñāna-tapasā pūtā mad-bhāvam āgatāḥ
अर्थ:राग, भय और क्रोध से रहित, मुझमें तन्मय हुए, मेरे शरण आए हुए बहुत से पुरुष ज्ञानरूपी तप से पवित्र होकर मेरे स्वरूप को प्राप्त हुए हैं।।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें
श्रीमद्भगवद्गीता ४.१० — वीतरागभयक्रोधा पाठ के लाभ
शरणागति और आन्तरिक शुद्धि के द्वारा ईश्वर-प्राप्ति का मार्ग दिखाता है
हृदय को राग, भय और क्रोध से मुक्त करने में सहायक है
भगवान में प्रेमपूर्ण तन्मयता को गहरा करता है
यथार्थ ज्ञान की अग्नि (ज्ञान-तप) से मन को पवित्र करता है
यह आश्वासन देता है कि हमसे पूर्व अनेकों ने मोक्ष प्राप्त किया है
भगवान में पूर्ण समर्पण और शरणागति की प्रेरणा देता है
श्रीमद्भगवद्गीता ४.१० — वीतरागभयक्रोधा जप विधि
इस श्लोक का पाठ राग, भय और क्रोध को त्यागने तथा भगवान की पूर्ण हृदय से शरण लेने के संकल्प के साथ करें। यह आन्तरिक शुद्धि और भगवान में प्रेमपूर्ण तन्मयता दोनों की प्रेरणा दे। नियमित जप करने पर यह समर्पण को सुदृढ़ करता है, विचलित करने वाले भावों को शान्त करता है और हृदय को भगवान के शुद्ध स्वरूप की ओर मोड़ता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
ये भी पढ़ें
ॐ
Explore more sacred mantras with complete meaning and chanting guides