श्रीमद्भगवद्गीता ४.१८ — कर्मण्यकर्म यः पश्येत्
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✦ अर्थ
ज्ञान और कर्म के योग वाले अध्याय का यह प्रसिद्ध एवं सूक्ष्म श्लोक कर्म के विषय में परम ज्ञान प्रकट करता है। वास्तविक ज्ञानी तीव्र कर्म के मध्य भी आत्मा की निश्चलता देखता है (कर्म में अकर्म), और यह पहचानता है कि केवल बाहरी निष्क्रियता सच्चा संन्यास नहीं है (अकर्म में कर्म)। इस अनुभूति में स्थित ऐसा पुरुष सच्चा योगी है जिसने समस्त कर्म का प्रयोजन पूर्ण कर लिया है। यह कर्म करते हुए भी भीतर से मुक्त और अछूते रहने की ओर संकेत करता है।
उत्पत्ति और कथा
Bhagavad Gita Chapter 4, Verse 18 · Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva) · Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)
चौथे अध्याय, ज्ञान और कर्म-संन्यास योग में, भगवान श्रीकृष्ण कर्म, अकर्म और विकर्म (निषिद्ध कर्म) के सूक्ष्म स्वरूप को समझाते हैं, यह कहते हुए कि इनके विषय में ज्ञानी भी मोहित हो जाते हैं। यह श्लोक कुंजी देता है: सच्चा ज्ञानी आत्मा को समस्त कर्म के भीतर अकर्ता रूप में देखता है, और इसलिए बिना बँधे कर्म करता है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
जिन महान ऋषियों ने अत्यन्त सक्रिय जीवन जिए — राज्यों का मार्गदर्शन, शिष्यों को शिक्षा, मानवता की सेवा — वे भीतर से सदा मुक्त और अछूते रहे माने जाते हैं, इस श्लोक को साकार करते हुए अपने समस्त कर्म में अकर्म देखकर और इस प्रकार बिना बन्धन के सब कुछ सिद्ध करके।
मंत्र
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कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः। स बुद्धिमान् मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्॥
karmaṇyakarma yaḥ paśhyed akarmaṇi cha karma yaḥ sa buddhimān manuṣhyeṣhu sa yuktaḥ kṛitsna-karma-kṛit
अर्थ:जो पुरुष कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान है; वह योगी है और सम्पूर्ण कर्मों को करने वाला है।।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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श्रीमद्भगवद्गीता ४.१८ — कर्मण्यकर्म यः पश्येत् पाठ के लाभ
कर्म का गूढ़तम रहस्य प्रकट करता है — कर्म करते हुए भी भीतर से निश्चल रहना
पूर्ण रूप से कर्म में संलग्न रहते हुए भी कर्म-बन्धन से मुक्त करता है
आत्मा और कर्म के बीच विवेक (विवेक-बुद्धि) विकसित करता है
व्यस्त जीवन के मध्य साक्षी-आत्मा की शान्ति लाता है
सच्चे संन्यास की ओर ले जाता है, जो आन्तरिक है, केवल बाह्य नहीं
एक सच्चे योगी और समस्त धर्ममय कर्मों के साधक के मन को चिह्नित करता है
श्रीमद्भगवद्गीता ४.१८ — कर्मण्यकर्म यः पश्येत् जप विधि
इस श्लोक का चिन्तनपूर्वक जप करें, इसके विरोधाभास को भीतर खुलने दें: शरीर के कर्म करते हुए भी भीतर की आत्मा मौन साक्षी बनी रहती है। यह उनके लिए आदर्श है जो सक्रिय जीवन को गहन आध्यात्मिक मुक्ति के साथ जोड़ना चाहते हैं। इसे इस चिन्तन के साथ दोहराएँ कि सच्चा ज्ञान कर्म से भागने में नहीं, अपितु समस्त कर्म के भीतर अपरिवर्तनशील आत्मा को देखने में है।
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