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श्री गंगा चालीसा

🕉️ hindu·📿 1× जप·🕐 सूर्योदय; गंगा दशहरा और गंगा जयंती; नदी में स्नान या उसका सम्मान करते समय·🎵 ऑडियो सहित·📜 Traditional Hindi devotional chalisa

अन्य नाम / खोज: jaya jaya jaya jaga pavani jayati devasari gamga · ganga chalisa lyrics

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अर्थ

गंगा चालीसा माँ गंगा की स्तुति में रचा गया भक्तिमय हिंदी स्तोत्र है, जो उनकी अवतरण-कथा और पाप धोने की शक्ति का वर्णन करता है। इसमें भगीरथ के तप, शिव की जटाओं से प्रवाह और सगर-पुत्रों के उद्धार का स्मरण है। यह पवित्रता, समृद्धि और शांति के लिए पढ़ी जाती है।

उत्पत्ति और कथा

Traditional Hindi devotional chalisa · Sundardas (as named in the closing verse) · Devotional era

गंगा देवी रूप में पूजित पावन नदी हैं जो तीनों लोकों में बहती हैं: स्वर्ग में मंदाकिनी, पृथ्वी पर भागीरथी-जाह्नवी और पाताल में भगवती रूप में। चालीसा स्मरण कराती है कि किस प्रकार भगीरथ के तप से वे स्वर्ग से उतरीं और पृथ्वी को उनके वेग से बचाने हेतु शिव की जटाओं में धारण की गईं, फिर सगर के पूर्वजों के उद्धार के लिए आगे बहीं, और उन सबकी शाश्वत पावनकर्ता बनीं जो उनके पास आते हैं।

शास्त्रों में वर्णित

माना जाता है कि दूर से भी 'गंगा, गंगा' उच्चारण मात्र, या जीवन के अंत में उनके जल की एक बूँद, अनेक जन्मों के पाप धो देती है, क्योंकि उनके नाम पर यमराज स्वयं मुड़ जाते हैं; जिस नदी ने सगर के साठ हजार पुत्रों का उद्धार किया, वह आज भी अपने भक्तों का उद्धार करती है।

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सम्पूर्ण पाठ अर्थ सहित

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दोहा 1

जय जय जय जग पावनी जयति देवसरि गंग जय शिव जटा निवासिनी अनुपम तुंग तरंग

Jaya jaya jaya jaga pavani jayati devasari gamga Jaya shiva jata nivasini anupama tumga taramga

अर्थ:जय जय जय गंगे, जगत् की पावनी, देवताओं की नदी! शिव की जटाओं में निवास करने वाली, अनुपम और ऊँची तरंगों वाली को नमन।

दोहा 2

जय जग जननि अघ खानी, आनन्द करनि गंग महरानी जय भागीरथि सुरसरि माता, कलिमल मूल दलनि विखयाता ।।

Jaya jaga janani agha khani, ananda karani gamga maharani Jaya bhagirathi surasari mata, kalimala mula dalani vikhayata

अर्थ:जय हो जगत् जननी, पापों का नाश करने वाली, आनंद देने वाली गंगा महारानी! जय भागीरथी, देवों की सरि-माता, कलियुग के पापों के मूल को नष्ट करने वाली रूप में विख्यात।

चौपाई 1

जय जय जय हनु सुता अघ अननी, भीषम की माता जग जननी धवल कमल दल मम तनु साजे, लखि शत शरद चन्द्र छवि लाजे ।।

Jaya jaya jaya hanu suta agha anani, bhishama ki mata jaga janani Dhavala kamala dala mama tanu saje, lakhi shata sharada chandra chhavi laje

अर्थ:जय जाह्नवी, पाप का नाश करने वाली, भीष्म की माता और जगत् जननी! आपका रूप कमलों के समूह सा श्वेत शोभित है; उसे देखकर सौ शरद चंद्रों की छवि भी लज्जित हो जाती है।

चौपाई 2

वाहन मकर विमल शुचि सोहै, अमिय कलश कर लखि मन मोहै जडित रत्न कंचन आभूषण, हिय मणि हार, हरणितम दूषण ।।

Vahana makara vimala shuchi sohai, amiya kalasha kara lakhi mana mohai Jadita ratna kamchana abhushana, hiya mani hara, haranitama dushana

अर्थ:आपका निर्मल, पवित्र मकर वाहन सुशोभित है; हाथ में अमृत कलश देखकर मन मोहित हो जाता है। स्वर्ण और जड़े रत्नों के आभूषणों से सजी, वक्ष पर मणि-हार धारण किए, आप हर दोष और पाप के अंधकार को हर लेती हैं।

चौपाई 3

जग पावनि त्रय ताप नसावनि, तरल तरंग तंग मन भावनि जो गणपति अति पूज्य प्रधाना, तिहुं ते प्रथम गंग अस्नाना ।।

Jaga pavani traya tapa nasavani, tarala taramga tamga mana bhavani Jo ganapati ati pujya pradhana, tihum te prathama gamga asnana

अर्थ:जगत् की पावनी, तीनों तापों का नाश करने वाली, आपकी तरल, उठती तरंगें मन को भाती हैं। जो गणपति अत्यंत पूज्य और प्रधान हैं, उनसे भी पहले गंगा का स्नान आता है।

चौपाई 4

ब्रह्म कमण्डल वासिनी देवी श्री प्रभु पद पंकज सुख सेवी साठि सहत्र सगर सुत तारयो, गंगा सागर तीरथ धारयो ।।

Brahma kamandala vasini devi shri prabhu pada pamkaja sukha sevi Sathi sahatra sagara suta tarayo, gamga sagara tiratha dharayo

अर्थ:हे देवी जो कभी ब्रह्मा के कमंडल में निवास करती थीं, जो आनंदपूर्वक प्रभु के चरण-कमलों की सेवा करती थीं! आपने सगर के साठ हजार पुत्रों का उद्धार किया और गंगासागर तीर्थ की स्थापना की।

चौपाई 5

अगम तरंग उठयो मन भावन, लखि तीरथ हरिद्वार सुहावन तीरथ राज प्रयाग अक्षैवट, धरयौ मातु पुनि काशी करवट ।।

Agama taramga uthayo mana bhavana, lakhi tiratha haridvara suhavana Tiratha raja prayaga akshaivata, dharayau matu puni kashi karavata

अर्थ:आपकी अगम तरंगें उठती हैं, मन को भाती हैं; देखो हरिद्वार का सुंदर पावन तीर्थ। तीर्थराज प्रयाग अक्षयवट सहित, और फिर हे माता, आप काशी (वाराणसी) की ओर मुड़ीं।

चौपाई 6

धनि धनि सुरसरि स्वर्ग की सीढ़ी, तारणि अमित पितृ पद पीढी भागीरथ तप कियो अपारा, दियो ब्रह्म तब सुरसरि धारा ।।

Dhani dhani surasari svarga ki sidha़i, tarani amita pitri pada pidhi Bhagiratha tapa kiyo apara, diyo brahma taba surasari dhara

अर्थ:धन्य धन्य हो देवों की सरि, स्वर्ग की सीढ़ी, अनगिनत पितरों की पीढ़ियों को तारने वाली! भगीरथ ने अपार तप किया, और तब ब्रह्मा ने देवसरि की धारा छोड़ी।

चौपाई 7

जब जग जननी चल्यो लहराई, शंभु जटा महं रह्यो समाई वर्ष पर्यन्त गंग महरानी, रहीं शंभु के जटा भुलानी ।।

Jaba jaga janani chalyo laharai, shambhu jata maham rahyo samai Varsha paryanta gamga maharani, rahim shambhu ke jata bhulani

अर्थ:जब जगत् जननी लहराती हुई बही, तब शंभु (शिव) की जटाओं में समाई रहीं। पूरे एक वर्ष तक गंगा महारानी शिव की जटाओं में खोई रहीं, भूली रहीं।

चौपाई 8

मुनि भागीरथ शंभुहिं ध्यायो, तब इक बूंद जटा से पायो ताते मातु भई त्रय धारा, मृत्यु लोक, नभ अरु पातारा ।।

Muni bhagiratha shambhuhim dhyayo, taba ika bumda jata se payo Tate matu bhai traya dhara, mrityu loka, nabha aru patara

अर्थ:मुनि भगीरथ ने शंभु का ध्यान किया, तब जटाओं से एक बूँद पाई। उससे, हे माता, आप तीन धाराएँ बनीं — मृत्यु लोक, आकाश और पाताल के लिए।

चौपाई 9

गई पाताल प्रभावति नामा, मन्दाकिनी गई गगन ललामा मृत्यु लोक जाह्नवी सुहावनि, कलिमल हरणि अगम जग पावनि ।।

Gai patala prabhavati nama, mandakini gai gagana lalama Mrityu loka jahnavi suhavani, kalimala harani agama jaga pavani

अर्थ:पाताल में आप भगवती नाम से गईं; आकाश में मंदाकिनी, गगन का आभूषण बनकर गईं। मृत्यु लोक में आप सुहावनी जाह्नवी हैं, कलियुग के मलों को हरने वाली, अगम जगत्-पावनी।

चौपाई 10

धनि मइया तव महिमा भारी, धर्म धुरि कलि कलुष कुठारी मातु प्रभावति धनि मन्दाकिनी, धनि सुरसरित सकल भयनासिनी ।।

Dhani maiya tava mahima bhari, dharma dhuri kali kalusha kuthari Matu prabhavati dhani mandakini, dhani surasarita sakala bhayanasini

अर्थ:धन्य माता, आपकी महिमा महान है, धर्म की धुरी, कलियुग के कलुष को काटने वाली कुठारी। माता भगवती धन्य, मंदाकिनी धन्य; धन्य देवसरि, समस्त भय का नाश करने वाली।

चौपाई 11

पान करत निर्मल गंगाजल, पावत मन इच्छित अनन्त फल पूरब जन्म पुण्य जब जागत, तबहिं ध्यान गंगा महं लागत ।।

Pana karata nirmala gamgajala, pavata mana ichchhita ananta phala Puraba janma punya jaba jagata, tabahim dhyana gamga maham lagata

अर्थ:निर्मल गंगाजल का पान करने से अनंत फल, मन की हर इच्छा प्राप्त होती है। पूर्व जन्मों का पुण्य जब जागता है, तभी मन गंगा के ध्यान में लगता है।

चौपाई 12

जई पगु सुरसरि हेतु उठावहिं, तइ जगि अश्वमेध फल पावहिं महा पतित जिन काहु तारे, तिन तारे इक नाम तिहारे ।।

Jai pagu surasari hetu uthavahim, tai jagi ashvamedha phala pavahim Maha patita jina kahu na tare, tina tare ika nama tihare

अर्थ:जो भी पग देवसरि के हेतु उठाए जाते हैं, उनसे इस जगत् में अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है। जिन महापापियों को कोई न तार सका, उन्हें आपके एक नाम ने तार दिया।

चौपाई 13

शत योजनहू से जो ध्यावहिं, निश्चय विष्णु लोक पद पावहिं नाम भजत अगणित अघ नाशै, विमल ज्ञान बल बुद्धि प्रकाशै ।।

Shata yojanahu se jo dhyavahim, nishchaya vishnu loka pada pavahim Nama bhajata aganita agha nashai, vimala jnana bala buddhi prakashai

अर्थ:जो सौ योजन दूर से भी आपका ध्यान करते हैं, वे निश्चय ही विष्णु लोक का पद पाते हैं। आपका नाम जपने से अगणित पाप नष्ट होते हैं और निर्मल ज्ञान, बल तथा बुद्धि प्रकाशित होती है।

चौपाई 14

जिमि धन मूल धर्म अरु दाना, धर्म मूल गंगाजल पाना तव गुण गुणन करत सुख भाजत, गृह गृह सम्पत्ति सुमति विराजत ।।

Jimi dhana mula dharma aru dana, dharma mula gamgajala pana Tava guna gunana karata sukha bhajata, griha griha sampatti sumati virajata

अर्थ:जैसे धन धर्म और दान का मूल है, वैसे गंगाजल का पान धर्म का मूल है। आपके गुणों का गुणगान करने से दुःख भाग जाता है; घर-घर में संपत्ति और सुमति विराजती है।

चौपाई 15

गंगहिं नेम सहित निज ध्यावत, दुर्जनहूं सज्जन पद पावत बुद्धिहीन विद्या बल पावै, रोगी रोग मुक्त ह्वै जावै ।।

Gamgahim nema sahita nija dhyavata, durjanahum sajjana pada pavata Buddhihina vidya bala pavai, rogi roga mukta hvai javai

अर्थ:जो दृढ़ नियम सहित गंगा का ध्यान करता है, दुर्जन भी सज्जन का पद पाता है। बुद्धिहीन विद्या का बल पाता है, और रोगी रोग से मुक्त हो जाता है।

चौपाई 16

गंगा गंगा जो नर कहहीं, भूखे नंगे कबहूं रहहीं निकसत की मुख गंगा माई, श्रवण दाबि यम चलहिं पराई ।।

Gamga gamga jo nara kahahim, bhukhe namge kabahum na rahahim Nikasata ki mukha gamga mai, shravana dabi yama chalahim parai

अर्थ:जो नर 'गंगा गंगा' कहते हैं, वे कभी भूखे-नंगे नहीं रहते। मुख से 'गंगा माई' निकलते ही, यम कान दबाकर भाग जाता है।

चौपाई 17

महां अधिन अधमन कहं तारें, भए नर्क के बन्द किवारे जो नर जपै गंग शत नामा, सकल सिद्ध पूरण ह्वै कामा ।।

Maham adhina adhamana kaham tarem, bhae narka ke banda kivare Jo nara japai gamga shata nama, sakala siddha purana hvai kama

अर्थ:आप महान अधम और पतितों को भी तार देती हैं; उनके लिए नरक के द्वार बंद हो जाते हैं। जो नर गंगा के सौ नाम जपता है, उसके सब काम सिद्ध और पूर्ण हो जाते हैं।

चौपाई 18

सब सुख भोग परम पद पावहिं, आवागमन रहित ह्वै जावहिं धनि मइया सुरसरि सुखदैनी, धनि धनि तीरथ राज त्रिवेणी ।।

Saba sukha bhoga parama pada pavahim, avagamana rahita hvai javahim Dhani maiya surasari sukhadaini, dhani dhani tiratha raja triveni

अर्थ:वे सब सुख भोगते हैं और परम पद पाते हैं, आवागमन (जन्म-मृत्यु) से रहित हो जाते हैं। धन्य माता देवसरि, सुख देने वाली; धन्य धन्य तीर्थराज त्रिवेणी।

अंतिम दोहा

ककरा ग्राम ऋषि दुर्वासा, सुन्दरदास गंगा कर दासा जो यह पढ़ै गंगा चालीसा, मिलै भक्ति अविरल वागीसा ।।

Kakara grama rishi durvasa, sundaradasa gamga kara dasa Jo yaha padha़ai gamga chalisa, milai bhakti avirala vagisa

अर्थ:ककरा ग्राम में, ऋषि दुर्वासा के स्थान पर, सुंदरदास गंगा के दास हैं। जो यह गंगा चालीसा पढ़ता है, उसे अविरल भक्ति और वाणी के स्वामी (वागीश) की कृपा मिलती है।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

देवसरि🔊Devasariदेवसरि — देवताओं की नदी, गंगा का नाम जो स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल में बहती हैं
भागीरथी🔊Bhagirathiभागीरथी — 'भगीरथ द्वारा लाई गई' गंगा, जिनके तप ने उन्हें पूर्वजों के उद्धार हेतु पृथ्वी पर उतारा
जाह्नवी🔊Jahnaviजाह्नवी — 'जह्नु की पुत्री', वह ऋषि जिन्होंने गंगा को पीकर फिर छोड़ा, यह नाम दिया
त्रिवेणी🔊Triveniत्रिवेणी — प्रयाग (प्रयागराज) में गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती का संगम
सगर सुत🔊Sagara-sutaसगर सुत — राजा सगर के साठ हजार पुत्र, गंगा का जल उनकी राख तक पहुँचने पर उद्धार हुए

श्री गंगा चालीसा पाठ के लाभ

पावन नदी-देवी माँ गंगा का आवाहन करने, पापों के क्षय, आंतरिक शुद्धि और मन की शांति के लिए पढ़ी जाती है।

गंगा के अवतरण (भगीरथ का तप, शिव की जटाओं से उनका प्रवाह और सगर-पुत्रों का उद्धार) का वर्णन कर, श्रद्धा और भक्ति को गहरा करती है।

माना जाता है कि यह उन्हें भी गंगा-स्नान का फल देती है जो उनके तट से दूर हैं, और भक्त को आरोग्य, समृद्धि तथा निर्भयता प्रदान करती है।

विशेषकर गंगा दशहरा, गंगा जयंती, कार्तिक पूर्णिमा और मकर संक्रांति पर तथा गंगा में स्नान या अर्पण के समय पढ़ी जाती है।

मा गंगा की उपासना को पूर्ण करने के लिए गंगा आरती ('ॐ जय गंगे माता') के साथ गाई जाती है।

श्री गंगा चालीसा जप विधि

जप संख्या1बार
उत्तम समयसूर्योदय; गंगा दशहरा और गंगा जयंती; नदी में स्नान या उसका सम्मान करते समय
दिशाFacing the river, or East

स्नान के बाद गंगा या उनकी छवि के सामने बैठें, दीप जलाएँ और पुष्प अर्पित करें, और यदि संभव हो तो गंगाजल अपने समक्ष रखें। उनके पृथ्वी पर अवतरण का स्मरण करते हुए चालीसा भक्ति से पढ़ें और गंगा आरती से समापन करें। गंगा दशहरा पर और पवित्र डुबकी लेते समय इसे विशेष श्रद्धा से अर्पित किया जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यह माँ गंगा, देवी रूप में पूजित पावन नदी, की स्तुति में रचा गया भक्तिमय हिंदी स्तोत्र है। यह उनके पृथ्वी पर अवतरण और पाप धोने की शक्ति का वर्णन करती है, और शुद्धि, आशीर्वाद तथा शांति के लिए पढ़ी जाती है।
गंगा एक जीवंत देवी के रूप में पूजित हैं जो राजा भगीरथ के पूर्वजों के उद्धार हेतु स्वर्ग से शिव की जटाओं के माध्यम से उतरीं। उनका जल परम पवित्र माना जाता है, जो पापों को धो देता है, इसलिए उन्हें 'गंगा मैया', माँ गंगा कहकर सम्मानित किया जाता है।
इसका पाठ प्रतिदिन सूर्योदय पर किया जा सकता है, और विशेष रूप से गंगा दशहरा तथा गंगा जयंती (उनके अवतरण और प्राकट्य दिवस) पर, कार्तिक पूर्णिमा और मकर संक्रांति पर तथा गंगा में स्नान या अर्पण करते समय शुभ है।
राजा भगीरथ ने महान तप किया ताकि स्वर्ग की गंगा उतरकर सगर के साठ हजार पुत्रों का उद्धार करें, जो एक ऋषि के शाप से भस्म हो गए थे। उनके प्रबल वेग को रोकने के लिए शिव ने गंगा को अपनी जटाओं में धारण किया और धीरे-धीरे छोड़ा, और इस प्रकार वे भागीरथी रूप में पृथ्वी पर बहीं।
गंगा चालीसा गंगा की महिमा और कथा का वर्णन करने वाला लंबा श्लोकबद्ध स्तोत्र है, जबकि गंगा आरती ('ॐ जय गंगे माता') नदी-तट की आरती में गाया जाने वाला दीप-अर्पण का छोटा गीत है। भक्त प्रायः चालीसा पढ़कर फिर आरती करते हैं।

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