Mantra.Tips
pranayamagayatrivyahritisandhyavandana

प्राणायाम मन्त्र

🕉️ hindu·📿 3× जप·🕐 तीनों सन्ध्याओं में — प्रातः, मध्याह्न और सायं — तथा किसी भी ध्यान या पूजा से पूर्व·📜 Yajurveda / Taittiriya tradition (Sandhyavandana ritual); Gayatri verse from Rigveda 3.62.10

अन्य नाम / खोज: pranayam mantra · gayatri pranayama · om bhuh om bhuvah om suvah · gayatri with vyahritis · gayatri shiras · sapta vyahriti · sandhya pranayama mantra

Share:

अर्थ

यह गायत्री मन्त्र का पूर्ण अनुष्ठानिक रूप है — आरम्भ में सात व्याहृतियाँ (भूः से सत्यम् तक, सात लोकों के नाम) और अन्त में गायत्री-शिरस् ('आपो ज्योती…')। इसका प्रयोग नित्य सन्ध्यावन्दन में प्राणायाम के समय होता है: साधक पूरक, कुम्भक और रेचक द्वारा श्वास का नियमन करते हुए इसका एक बार मानसिक जप करता है। इसका उच्चारण श्वास, मन और ब्रह्माण्ड को दिव्य सौर-ज्योति के ध्यान में एक कर देता है।

उत्पत्ति और कथा

Yajurveda / Taittiriya tradition (Sandhyavandana ritual); Gayatri verse from Rigveda 3.62.10 · Sage Vishvamitra (the Gayatri verse); the Vyahritis and Shiras from Vedic ritual · Vedic

केन्द्रीय श्लोक प्रसिद्ध गायत्री मन्त्र है, जो ऋग्वेद में ऋषि विश्वामित्र को प्रकट हुआ। त्रिकाल सन्ध्यावन्दन में अनुष्ठानिक प्रयोग हेतु वैदिक परम्परा इसे सात व्याहृतियों से आवृत करती है — तैत्तिरीय आरण्यक के अनुसार ये तब उत्पन्न हुईं जब प्रजापति ने लोकों पर ध्यान किया — और इसे गायत्री-शिरस् से मुकुटित करती है। इसी पूर्ण रूप में यह प्राणायाम का मन्त्र बना, जो नियन्त्रित श्वास को सविता की ज्योति के ध्यान से जोड़ता है और प्रत्येक ब्राह्मण का दिन आरम्भ करता है।

शास्त्रों में वर्णित

परम्परागत रूप से माना जाता है कि इस मन्त्र सहित किया गया प्राणायाम श्वास एवं इन्द्रियों की अशुद्धियों को उसी प्रकार भस्म कर देता है जैसे अग्नि स्वर्ण को शुद्ध करती है; मनुस्मृति घोषित करती है कि व्याहृतियों एवं प्रणव सहित प्राणायाम से इन्द्रियों के पाप भस्म हो जाते हैं। ऋषि कहते हैं कि जो गायत्री पर श्वास को स्थिर करता है, वह हृदय में आन्तरिक सौर-ज्योति का उदय देखता है।

मंत्र

किसी भी पंक्ति या ▶ बटन पर टैप कर सुनें

भूः। भुवः। सुवः। महः। जनः। तपः। सत्यम्। तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्॥ आपो ज्योती रसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुवःसुवरोम्॥

Om Bhuh. Om Bhuvah. Om Suvah. Om Mahah. Om Janah. Om Tapah. Om Satyam. Om Tat-Savitur Varenyam Bhargo Devasya Dhimahi. Dhiyo Yo Nah Prachodayat. Om Apo Jyoti Raso-mritam Brahma Bhur-Bhuvah-Suvar-Om.

अर्थ:ॐ भूः (पृथ्वी), ॐ भुवः (अन्तरिक्ष), ॐ सुवः (स्वर्ग), ॐ महः (महर्लोक), ॐ जनः (जनलोक), ॐ तपः (तपोलोक), ॐ सत्यम् (सत्यलोक)। उस सविता (सूर्यदेव) के परम वरणीय, दिव्य, पापनाशक तेज का हम ध्यान करते हैं; वह हमारी बुद्धि को सत्प्रेरणा दे। ॐ — जल, ज्योति, रस, अमृत, ब्रह्म — भूः भुवः सुवः ॐ। (सात व्याहृतियाँ सात लोकों की हैं; मध्य की पंक्ति गायत्री मन्त्र है; अन्तिम पंक्ति उसका 'शिरस्' है, जिसे प्राणायाम के समय बोला जाता है।)

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

🔊Omआदिनाद, प्रणव, स्वयं ब्रह्म — प्रत्येक व्याहृति से पूर्व उच्चारित
भूः🔊Bhuhपृथ्वी लोक — प्रथम व्याहृति (स्थूल भौतिक जगत्)
भुवः🔊Bhuvahअन्तरिक्ष / मध्य प्रदेश — द्वितीय व्याहृति
सुवः🔊Suvahस्वर्गलोक — तृतीय व्याहृति ('स्वः' भी उच्चारित)
महः🔊Mahahमहर्लोक, महानता का लोक — चतुर्थ व्याहृति
जनः🔊Janahजनलोक, सृष्टि का लोक — पञ्चम व्याहृति
तपः🔊Tapahतपोलोक, तपस्या का लोक — षष्ठ व्याहृति
सत्यम्🔊Satyamसत्यलोक, सत्य का लोक — सप्तम व्याहृति, ब्रह्मा का धाम
तत्सवितुः🔊Tat-Savituhवह (परम), सविता का — सबके दीप्तिमान सौर मूल का
वरेण्यम्🔊Varenyamपरम वरणीय, सर्वथा प्राप्त करने योग्य
भर्गो देवस्य🔊Bhargo Devasyaउस देव का दिव्य, पापनाशक तेज (भर्ग)
धीमहि🔊Dhimahiहम ध्यान करते हैं, हम चिन्तन करते हैं
धियो यो नः प्रचोदयात्🔊Dhiyo Yo Nah Prachodayatवह हमारी बुद्धि (मति) को प्रेरित एवं प्रकाशित करे
आपो ज्योती🔊Apo Jyotiजल और ज्योति (पोषक एवं प्रकाशक तत्त्व)
रसोऽमृतम्🔊Raso-mritamरस (सार) एवं अमृत (अमरत्व-नेक्टर)
ब्रह्म🔊Brahmaब्रह्म, परम तत्त्व
भूर्भुवःसुवरोम्🔊Bhur-Bhuvah-Suvar-Omॐ से अंकित तीनों लोक — गायत्री का शिरस् (मस्तक)

प्राणायाम मन्त्र पाठ के लाभ

नित्य सन्ध्यावन्दन अनुष्ठान में प्राणायाम के लिए निर्धारित मन्त्र

श्वास-नियमन को गायत्री के ध्यान से जोड़ता है, शरीर और मन दोनों को एक साथ स्थिर करता है

सात व्याहृतियाँ सात लोकों को पवित्र करती हैं, पृथ्वी से सत्यलोक तक चेतना का विस्तार करती हैं

बुद्धि को शुद्ध एवं प्रेरित करने हेतु सविता की प्रकाशक कृपा का आवाहन करती हैं (प्रचोदयात्)

शिरस् ('आपो ज्योती…') जल, ज्योति, रस, अमृत और ब्रह्म की एकता की पुष्टि करता है

जप, पूजा या ध्यान से पूर्व शान्ति, एकाग्रता और प्राणिक सन्तुलन का विकास करता है

प्राणायाम मन्त्र जप विधि

जप संख्या3बार
उत्तम समयतीनों सन्ध्याओं में — प्रातः, मध्याह्न और सायं — तथा किसी भी ध्यान या पूजा से पूर्व

पूर्व (या उत्तर) की ओर मुख करके सीधे बैठें। अँगूठे से दाहिनी नासिका बन्द करके बायीं से धीरे-धीरे श्वास लें (पूरक) और सम्पूर्ण मन्त्र का एक बार मानसिक जप करें। दोनों नासिकाएँ बन्द करके श्वास रोकें (कुम्भक), इसे दूसरी बार जपते हुए। फिर दाहिनी नासिका से श्वास छोड़ें (रेचक), इसे तीसरी बार जपते हुए। यह प्राणायाम का एक चक्र है; सामान्यतः तीन चक्र किए जाते हैं। मेरुदण्ड सीधा रखें और मन को सविता की सौर-ज्योति पर एकाग्र रखें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सामान्य गायत्री केवल एक श्लोक 'ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं…' है। प्राणायाम और सन्ध्यावन्दन के लिए इसका विस्तृत रूप बोला जाता है: पहले प्रणव 'ॐ', फिर सात व्याहृतियाँ (भूः, भुवः, सुवः, महः, जनः, तपः, सत्यम्), फिर गायत्री श्लोक, और अन्त में गायत्री-शिरस् ('ॐ आपो ज्योती रसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुवःसुवरोम्')।
व्याहृतियाँ सात ब्रह्माण्डीय लोकों के नाम लेने वाले पवित्र उच्चारण हैं: भूः (पृथ्वी), भुवः (अन्तरिक्ष), सुवः/स्वः (स्वर्ग), महः, जनः, तपः और सत्यम्। प्रथम तीन 'महाव्याहृतियाँ' हैं और सर्वाधिक प्रयुक्त होती हैं; पूर्ण प्राणायाम रूप में सातों आती हैं।
शिरस् ('मस्तक' या मुकुट) गायत्री के पश्चात् जोड़ी जाने वाली पंक्ति 'ॐ आपो ज्योती रसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुवःसुवरोम्' है। यह दिव्य ज्योति को जल, सार, अमृत और ब्रह्म के साथ एकाकार करती है और ध्यान को सम्पन्न करती है। इसका प्रयोग विशेषतः अनुष्ठानिक प्राणायाम में होता है।
परम्परागत रूप से इस अनुष्ठानिक रूप की गायत्री उपनयन/गायत्री दीक्षा द्वारा प्राप्त की जाती है और सन्ध्यावन्दन में प्रयुक्त होती है। तथापि अनेक आचार्य भक्तों को श्रद्धा एवं स्वच्छ, शान्त आसन के साथ सरल गायत्री श्लोक का श्वास-जागरूकता और ध्यान हेतु प्रयोग करने को प्रोत्साहित करते हैं।

ये भी पढ़ें

उपयोगी लगा? अपनों के साथ साझा करें 🙏

Share:

Explore more sacred mantras with complete meaning and chanting guides