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घालीन लोटांगण

🕉️ hindu·📿 1× जप·🕐 किसी भी आरती या पूजा के समापन पर, प्रातः अथवा सायंकाल·📜 Marathi aarti tradition (Varkari sampradaya); opening verse by Sant Namdev

अन्य नाम / खोज: ghalin lotangan · ghalin lotangan vandin charan · tvameva mata cha pita tvameva · kayena vacha manasendriyairva · marathi closing aarti · घालीन लोटांगण

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अर्थ

घालीन लोटांगण मराठी पूजा की प्रिय समापन-प्रार्थना है, जो महाराष्ट्र भर में लगभग हर आरती के अंत में गाई जाती है। यह संत नामदेव के पूर्ण भक्ति के पद से आरंभ होती है — लोटांगण, दर्शन, आलिंगन और पूजन — और प्रसिद्ध संस्कृत श्लोकों 'त्वमेव माता' (तुम ही माता, पिता, सर्वस्व) तथा 'कायेन वाचा' (मेरे सभी कर्म नारायण को अर्पित) से जुड़ती है। ये मिलकर पूजा के अंत में पूर्ण समर्पण का सुंदर भाव रचते हैं।

उत्पत्ति और कथा

Marathi aarti tradition (Varkari sampradaya); opening verse by Sant Namdev · Sant Namdev (opening verse); traditional Sanskrit shlokas · 13th century CE and later

घालीन लोटांगण समस्त महाराष्ट्र में पूजा की सार्वभौमिक समापन-प्रार्थना बन गई है। इसका पहला पद संत नामदेव का है, जो बुनकर-संत और ज्ञानेश्वर के सहयोगी थे, जिन्होंने भक्ति का सम्पूर्ण भाव उँडेल दिया — प्रभु के समक्ष लोटांगण करना, देखना, आलिंगन करना, पूजा करना और आरती उतारना। इससे जुड़ता है सनातन संस्कृत श्लोक 'त्वमेव माता' जो प्रभु को अपना प्रत्येक सम्बन्ध घोषित करता है, और 'कायेन वाचा' जो अपने सभी कर्म नारायण को अर्पित करता है। प्रत्येक आरती के अंत में गाया जाकर यह विधिवत् पूजा को हार्दिक आत्म-समर्पण में बदल देता है।

शास्त्रों में वर्णित

कहा जाता है कि विट्ठल अपने भक्त नामदेव से इतना प्रेम करते थे कि जब बालक नामदेव ने प्रभु की प्रतिमा को भोग अर्पित किया, तब विट्ठल वास्तव में प्रकट होकर उसे खा गए। ऐसी आत्मीयता 'घालीन लोटांगण' में साँस लेती है, जिसके समापन-समर्पण को भक्त मानते हैं कि वह उनके दिन के प्रत्येक कर्म को नारायण के चरणों तक पहुँचाता है।

सम्पूर्ण पाठ अर्थ सहित

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श्लोक 1

घालीन लोटांगण वंदीन चरण डोळ्यांनी पाहीन रूप तुझे प्रेमे आलिंगिन आनंदे पूजिन भावे ओवाळीन म्हणे नामा

Ghalin Lotangan Vandin Charan | Dolyanni Pahin Roop Tuze || Preme Aalingin Aanande Poojin | Bhave Ovalin Mhane Nama ||

अर्थ:मैं साष्टांग लोटांगण करूँगा और तुम्हारे चरणों में वंदना करूँगा; अपनी आँखों से तुम्हारा रूप देखूँगा। प्रेम से आलिंगन करूँगा, आनंद से पूजा करूँगा, और भावपूर्वक आरती उतारूँगा — ऐसा नामा (नामदेव) कहते हैं।

श्लोक 2

त्वमेव माता पिता त्वमेव त्वमेव बंधुश्च सखा त्वमेव त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देवदेव

Tvameva Mata Cha Pita Tvameva | Tvameva Bandhushcha Sakha Tvameva || Tvameva Vidya Dravinam Tvameva | Tvameva Sarvam Mama Deva-Deva ||

अर्थ:तुम ही मेरी माता हो और तुम ही पिता; तुम ही बंधु हो और तुम ही सखा; तुम ही विद्या हो और तुम ही धन; तुम ही मेरा सर्वस्व हो, हे देवों के देव।

श्लोक 3

कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा बुद्ध्यात्मना वा प्रकृतेः स्वभावात् करोमि यद्यत्सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयामि

Kayena Vacha Manasendriyairva | Buddhyatmana Va Prakriteh Svabhavat || Karomi Yadyat-Sakalam Parasmai | Narayanayeti Samarpayami ||

अर्थ:शरीर से, वाणी से, मन और इंद्रियों से, बुद्धि और आत्मा से, अथवा प्रकृति के स्वभाव से — जो कुछ भी मैं करता हूँ, वह सब परमात्मा नारायण को समर्पित करता हूँ।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

घालीन लोटांगण🔊Ghalin Lotanganमैं साष्टांग लोटांगण करूँगा (दण्डवत् भूमि पर लेट जाऊँगा)
वंदीन चरण🔊Vandin Charanमैं श्रद्धापूर्वक तुम्हारे चरणों में वंदना करूँगा
डोळ्यांनी पाहीन रूप तुझे🔊Dolyanni Pahin Roop Tuzeमैं अपनी आँखों से तुम्हारा रूप देखूँगा
प्रेमे आलिंगिन🔊Preme Aalinginमैं प्रेम से (तुम्हें) आलिंगन करूँगा
आनंदे पूजिन🔊Aanande Poojinमैं आनंद से (तुम्हारी) पूजा करूँगा
भावे ओवाळीन🔊Bhave Ovalinमैं भावपूर्वक आरती उतारूँगा (दीप घुमाऊँगा)
म्हणे नामा🔊Mhane Namaऐसा नामा कहते हैं (संत नामदेव, कवि की मुद्रा)
त्वमेव माता च पिता त्वमेव🔊Tvameva Mata Cha Pita Tvamevaतुम ही माता हो और तुम ही पिता
त्वमेव बंधुश्च सखा त्वमेव🔊Tvameva Bandhushcha Sakha Tvamevaतुम ही बंधु हो और तुम ही सखा
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव🔊Tvameva Vidya Dravinam Tvamevaतुम ही विद्या हो और तुम ही धन
त्वमेव सर्वं मम देवदेव🔊Tvameva Sarvam Mama Deva-Devaतुम ही मेरा सर्वस्व हो, हे देवों के देव
कायेन वाचा🔊Kayena Vachaशरीर से, वाणी से
मनसेन्द्रियैर्वा🔊Manasendriyairvaअथवा मन और इंद्रियों से
बुद्ध्यात्मना वा🔊Buddhyatmana Vaअथवा बुद्धि और आत्मा से
प्रकृतेः स्वभावात्🔊Prakriteh Svabhavatअथवा प्रकृति के स्वभाव से
करोमि यद्यत्सकलं🔊Karomi Yadyat-Sakalamजो कुछ भी मैं करता हूँ, वह सब
परस्मै🔊Parasmaiपरमात्मा को
नारायणायेति समर्पयामि🔊Narayanayeti Samarpayamiनारायण को (वह) समर्पित करता हूँ

घालीन लोटांगण पाठ के लाभ

किसी भी पूजा को प्रभु के प्रति पूर्ण समर्पण के भाव से सम्पन्न करता है

प्रभु को माता, पिता, सखा और अपना सम्पूर्ण आश्रय रूप में व्यक्त करता है

शरीर, वाणी और मन के सभी कर्म नारायण को समर्पित कर दैनिक जीवन को पवित्र करता है

महाराष्ट्र भर के घरों और मंदिरों में आरती के अंत में सर्वत्र प्रिय और गाया जाता है

विनम्रता, भक्ति और समर्पण (अर्पण) के भाव का विकास करता है

छोटा, सुंदर और सभी आयु के लोगों के लिए सरलता से सीखने योग्य

घालीन लोटांगण जप विधि

जप संख्या1बार
उत्तम समयकिसी भी आरती या पूजा के समापन पर, प्रातः अथवा सायंकाल

आरती के बिल्कुल अंत में, देवता की अपनी आरतियाँ अर्पित हो जाने के बाद, हाथ जोड़कर खड़े होकर 'घालीन लोटांगण' गाएँ। नामदेव के मराठी पद से आरम्भ करें, फिर संस्कृत 'त्वमेव माता' और 'कायेन वाचा', साष्टांग प्रणाम करते हुए और अपने सभी कर्म प्रभु को अर्पित करते हुए। यह भक्ति की वह प्रथागत मुहर है जो वारकरी तथा व्यापक मराठी परम्परा में पूजा को सम्पन्न करती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यह मराठी पूजा की पारम्परिक समापन-प्रार्थना है, जो आरती के अंत में गाई जाती है। 'घालीन लोटांगण' का अर्थ है 'मैं साष्टांग लेट जाता हूँ'; यह प्रार्थना प्रभु को लोटांगण, दर्शन, आलिंगन और पूजन अर्पित करती है, और फिर पूर्ण आत्म-समर्पण करती है।
आरम्भिक मराठी पद में 'म्हणे नामा' की मुद्रा है, जो इसे संत नामदेव — पंढरपुर के महान 13वीं शताब्दी के वारकरी संत — से जोड़ती है। यह संस्कृत श्लोकों 'त्वमेव माता' और 'कायेन वाचा' से जुड़ता है, जो समस्त हिन्दू परम्पराओं में पढ़े जाते हैं।
देवता की स्तुति के बाद, उपासक पूर्ण समर्पण से समापन करता है — प्रभु को माता, पिता, सखा और सर्वस्व घोषित करते हुए, और अपने सभी कर्म नारायण को अर्पित करते हुए। यह विनम्रता और समर्पण का वह आदर्श भाव है जिस पर पूजा समाप्त होती है।
इसे पूजा के अंत में किसी भी देवता को अर्पित किया जा सकता है, किन्तु इसका वारकरी मूल इसे पंढरपुर के विट्ठल (पांडुरंग) से जोड़ता है, और इसके संस्कृत श्लोक परमात्मा को नारायण के रूप में सम्बोधित करते हैं — इसलिए इसे जिस भी प्रिय रूप में एक परमात्मा को अर्पित समझा जाता है।

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