इति दत्त्वा तयोर्देवी
अन्य नाम / खोज: iti dattva tayor devi · iti dattva tayor devi yathabhilashitam varam · babhuvantarhita sadyo bhaktya tabhyam abhishtuta · durga saptashati conclusion · devi mahatmya ending savarni manu
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✦ अर्थ
ये देवी माहात्म्य (दुर्गा सप्तशती) के समापन श्लोक हैं, जो सम्पूर्ण सात सौ श्लोकों के इस ग्रन्थ को उसके अन्त तक ले जाते हैं। राजा सुरथ और वैश्य समाधि को उनके इच्छित वर देकर देवी — उनके द्वारा भक्तिपूर्वक स्तुति की जाकर — तत्काल अन्तर्धान हो जाती हैं। तब मार्कण्डेय घोषणा करते हैं कि देवी का वर पाकर सुरथ सूर्य से पुनर्जन्म लेकर सावर्णि, आठवें मनु, होंगे। इस प्रकार वह पवित्र कथा समाप्त होती है जो उसी मनु की उत्पत्ति बताने के वचन से आरम्भ हुई थी।
उत्पत्ति और कथा
Durga Saptashati Chapter 13 · Maharshi Markandeya (traditionally ascribed) · Puranic period (c. 5th–6th century CE for the Devi Mahatmya)
देवी माहात्म्य (दुर्गा सप्तशती या चण्डी), जो मार्कण्डेय पुराण का अंश है, इस वचन से आरम्भ होता है कि ऋषि मार्कण्डेय बताएँगे कि सूर्यपुत्र सावर्णि महामाया की शक्ति से आठवें मनु कैसे बने। सम्पूर्ण ग्रन्थ — देवी की विजयों के तीन महान चक्र, जो ऋषि मेधा द्वारा राजा सुरथ और वैश्य समाधि को सुनाए गए — इसी फ्रेम के भीतर प्रकट होता है। इन अन्तिम श्लोकों में देवी, दोनों को उनके वर देकर, भक्तिपूर्वक स्तुति की जाकर तत्काल अन्तर्धान हो जाती हैं; और मार्कण्डेय घोषणा करते हैं कि उनसे वरदान पाकर सुरथ सूर्य से सावर्णि मनु रूप में पुनर्जन्म लेंगे। इस प्रकार वह पवित्र कथा वैसे ही समाप्त होती है जैसे वह आरम्भ हुई थी।
✦ शास्त्रों में वर्णित
परम्परा मानती है कि इन श्लोकों के साथ दुर्गा सप्तशती के पाठ की पूर्णता वही कृपा प्रदान करती है जो देवी ने सुरथ और समाधि को दी थी — सांसारिक कामनाओं की पूर्ति उनके लिए जो उन्हें चाहते हैं, और मुक्तिदायक ज्ञान उनके लिए जो स्वतन्त्रता चाहते हैं। भक्त इन्हें कृतज्ञता से पढ़ते हैं, इस विश्वास के साथ कि माता हृदय की सच्ची कामना पूर्ण करेंगी।
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मार्कण्डेय उवाच इति दत्त्वा तयोर्देवी यथाभिलषितं वरम् । बभूवान्तर्हिता सद्यो भक्त्या ताभ्यामभिष्टुता ॥
mārkaṇḍeya uvāca iti dattvā tayordevī yathābhilaṣitaṃ varam babhūvāntarhitā sadyo bhaktyā tābhyāmabhiṣṭutā
अर्थ:मार्कण्डेय बोले — इस प्रकार उन दोनों को यथेच्छ वर देकर देवी, उन दोनों द्वारा भक्तिपूर्वक स्तुति की जाकर तत्काल अन्तर्धान हो गईं।
एवं देव्या वरं लब्ध्वा सुरथः क्षत्रियर्षभः । सूर्याज्जन्म समासाद्य सावर्णिर्भविता मनुः ॥
evaṃ devyā varaṃ labdhvā surathaḥ kṣatriyarṣabhaḥ sūryājjanma samāsādya sāvarṇirbhavitā manuḥ
अर्थ:इस प्रकार देवी से वर पाकर क्षत्रियश्रेष्ठ सुरथ, सूर्य से जन्म पाकर सावर्णि (आठवें) मनु होंगे।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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इति दत्त्वा तयोर्देवी पाठ के लाभ
दुर्गा सप्तशती के पाठ की मंगलमय समाप्ति का सूचक
चण्डी पाठ के अन्त में उसके पुण्य को मुद्रित करने हेतु पढ़ा जाता है
देवी द्वारा अपने भक्तों के वरों की कृपापूर्ण पूर्ति की पुष्टि करता है
राजा सुरथ के भावी सावर्णि मनु बनने की नियति का वर्णन करता है
माता की उपासना में भक्ति और पूर्णता का भाव जगाता है
पवित्र कथा के समापन पर कृतज्ञता की उपयुक्त प्रार्थना
इति दत्त्वा तयोर्देवी जप विधि
इन समापन श्लोकों को दुर्गा सप्तशती (चण्डी पाठ) के पाठ को मुद्रित करने हेतु भक्तिपूर्वक पढ़ें, और देवी को कृतज्ञता अर्पित करें जब वे अपने भक्तों की कामनाएँ पूर्ण कर अन्तर्धान होती हैं। मन ही मन माता को प्रणाम करें, यह स्मरण करते हुए कि सच्ची उपासना उनकी कृपा प्राप्त कराती है, और अपने पाठ को पूर्णता एवं समर्पण के भाव में समाप्त करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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