जयाय जयभद्राय
अन्य नाम / खोज: jayaya jaya bhadraya · jayaya jayabhadraya haryashvaya namo namah · namo namah sahasramsho adityaya namo namah · aditya hridayam salutation verse
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✦ अर्थ
यह आदित्यहृदयम् का सत्रहवाँ श्लोक है और 'नमो नमः' की पुनरावृत्ति से गूँजता इस स्तोत्र का अत्यन्त प्रिय नमस्कार-श्लोक है। इसमें सूर्यदेव को जय (विजयस्वरूप), जयभद्र (कल्याणकारी विजय), हर्यश्व (हरित अश्वों के स्वामी) तथा सहस्रांशु (सहस्र किरण वाले) के रूप में स्तुत किया गया है। भक्त इसे सूर्य की विजय और कृपा हेतु एक उल्लासमय शीघ्र वन्दना के रूप में पढ़ते हैं।
उत्पत्ति और कथा
Aditya Hridayam, verse 17 (Valmiki Ramayana, Yuddha Kanda, Sarga 105) · Sage Agastya (as recorded by Maharishi Valmiki) · Ancient (Ramayana; text compiled c. 500 BCE–100 CE)
आदित्यहृदयम् के भीतर, सूर्य के अनेक ब्रह्माण्डीय रूपों का नामकरण करने के पश्चात्, ऋषि अगस्त्य प्रबल नमस्कारों की एक श्रृंखला में लीन हो जाते हैं। यह श्लोक उनमें सर्वाधिक गूँजने वाला है, जो सूर्य को विजय के साक्षात् स्वरूप रूप में पुनः-पुनः प्रणाम करता है — एक उपयुक्त आवाहन, क्योंकि इसे श्रीराम को उनकी रावण पर विजय की पूर्वसन्ध्या पर सिखाया गया था।
✦ शास्त्रों में वर्णित
भक्त बताते हैं कि किसी प्रतियोगिता या परीक्षा से पूर्व आदित्यहृदयम् की इन विजय-नमस्कारों का पाठ सूर्य की कृपा लाता है, ठीक जैसे इस स्तोत्र ने राम को साहस दिया, जो — तेजोमय एवं प्रफुल्ल — आगे बढ़े और उसी दिन रावण का वध किया।
मंत्र
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जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नमः । नमो नमः सहस्रांशो आदित्याय नमो नमः ॥
Jayaya jayabhadraya haryashvaya namo namah Namo namah sahasramsho adityaya namo namah
अर्थ:जयस्वरूप को, जिनकी जय कल्याणकारी है उन्हें, हरित अश्वों वाले को बार-बार नमस्कार है। हे सहस्र किरणों वाले, आपको बार-बार नमस्कार; आदित्य को बार-बार नमस्कार है।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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जयाय जयभद्राय पाठ के लाभ
सूर्य को विजय (जय) के साक्षात् स्वरूप रूप में आवाहित करने वाला एक शक्तिशाली नमस्कार-श्लोक
बार-बार आता 'नमो नमः' इसे लयबद्ध, ध्यानपूर्ण पाठ एवं जप के लिए आदर्श बनाता है
सफलता, कार्यों में विजय एवं पराजय के निवारण हेतु पारम्परिक रूप से जपा जाता है
सूर्य को सहस्रांशु, सहस्र किरण वाले के रूप में महिमामण्डित कर उनका तेजोमय आशीर्वाद खींचता है
छोटा और सरलता से कण्ठस्थ, इसे नित्य सूर्य उपासना अथवा सूर्य नमस्कार में जोड़ा जा सकता है
आदित्यहृदयम् का अंग है — वह स्तोत्र जिसने श्रीराम की रावण पर विजय सुनिश्चित की
जयाय जयभद्राय जप विधि
इस नमस्कार-श्लोक का सूर्य की ओर मुख करके पाठ करें, आदर्शतः सूर्य नमस्कार की बारह मुद्राओं के समय अथवा अर्घ्य अर्पित करते समय। पुनरावृत्त 'नमो नमः' स्वयं को बारह की गणना (प्रत्येक आदित्य / मास हेतु एक) के लिए उपयुक्त बनाता है। विजयी, सर्वतेजोमय सूर्य के प्रति उल्लासमय समर्पण के भाव से जपें। इसे अकेले अथवा सम्पूर्ण आदित्यहृदयम् के भीतर पढ़ा जा सकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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