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श्री आञ्जनेय स्तोत्रम् (रामदूत स्तोत्रम्)

🕉️ hindu·📿 11× जप·🕐 मंगलवार एवं शनिवार प्रातः, अथवा सन्ध्या समय; विशेषकर हनुमान जयन्ती के अवसर पर तथा रक्षा की कामना के समय।·📜 Traditional Hanuman stotra of the bija-mantra type (recited in the Sri Rama / Hanuman upasana tradition)

अन्य नाम / खोज: anjaneya stotram · sri ramaduta stotram · ramadootha anjaneya stotram · ram ram ram raktavarnam · aanjaneya stotra

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अर्थ

श्री रामदूत (आञ्जनेय) स्तोत्रम् हनुमान जी की एक प्रभावशाली पञ्चपदी स्तुति है, जिसमें प्रत्येक श्लोक एक बीजाक्षर — रं, खं, इं, सं और हं — की पुनरावृत्ति से आरम्भ होता है और 'रामदूतं नमामि' ('मैं राम के दूत को प्रणाम करता हूँ') से समाप्त होता है। सजीव चित्रण के द्वारा यह हनुमान के उग्र रक्षक स्वरूप, उनके वेदज्ञान, समुद्र-लंघन तथा चिन्मय स्वरूप की स्तुति करता है। इसका पाठ रक्षा, साहस, विघ्ननाश तथा ज्वर-रोगों की निवृत्ति के लिए किया जाता है।

उत्पत्ति और कथा

Traditional Hanuman stotra of the bija-mantra type (recited in the Sri Rama / Hanuman upasana tradition) · Traditional (attributed to the ancient Anjaneya upasana lineage) · Medieval / traditional

यह स्तोत्र मन्त्रमय हनुमान स्तुतियों के परिवार का है, जिनमें प्रत्येक श्लोक एक बीजाक्षर से बँधा होता है। हनुमान को रामदूत — राम के दूत — के रूप में सम्बोधित करते हुए यह उनके भयानक रक्षक स्वरूप, वेदों एवं तत्त्वों पर उनके अधिकार, समुद्र-लंघन के पराक्रम, तथा हंस (अन्तरात्मा) के रूप में उनकी परम पहचान को एक साथ पिरोता है। ऐसे बीज-युक्त स्तोत्र उपासना (तीव्र आराधना) के लिए रचे गए, जहाँ श्लोकों की ध्वनि ही देवता की जीवन्त उपस्थिति का आवाहन करती मानी जाती है।

शास्त्रों में वर्णित

भक्तजन बताते हैं कि इस बीज-आवेशित स्तोत्र के पाठ, विशेषकर हनुमान को विष एवं ज्वर का हर्ता (विषज्वर-हरणम्) कहने वाले श्लोक के पाठ का, लोक-परम्परा में ज्वर, सर्पदंश-भय एवं अदृश्य पीड़ाओं को शान्त करने हेतु प्रयोग किया गया है, और अक्षर स्वयं पाठकर्ता के चारों ओर एक रक्षा-कवच की भाँति कार्य करते हैं।

सम्पूर्ण पाठ अर्थ सहित

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श्लोक 1

रं रं रं रक्तवर्णं दिनकरवदनं तीक्ष्णदंष्ट्राकरालं रं रं रं रम्यतेजं गिरिचलनकरं कीर्तिपञ्चाननास्यम् रं रं रं राजयोगं सकलशुभनिधिं सप्तवेतालभेद्यं रं रं रं राक्षसान्तं सकलदिशियशं रामदूतं नमामि १॥

Ram Ram Ram Raktavarnam Dinakaravadanam Tikshna-Damshtra-Karalam Ram Ram Ram Ramyatejam Girichalanakaram Kirti-Panchananasyam | Ram Ram Ram Rajayogam Sakala-Shubha-Nidhim Sapta-Vetala-Bhedyam Ram Ram Ram Rakshasantam Sakala-Dishi-Yasham Ramadutam Namami || 1||

अर्थ:'रं रं रं' का जप करते हुए मैं रामदूत (हनुमान) को प्रणाम करता हूँ — जो रक्तवर्ण एवं सूर्य के समान मुख वाले, तीक्ष्ण दाढ़ों से कराल, रमणीय तेज वाले, पर्वतों को चलाने वाले, सिंह के समान कीर्तिमान मुख वाले हैं; जो राजयोग स्वरूप, समस्त शुभों के निधि, सात वेतालों का भेदन करने वाले, राक्षसों का अन्त करने वाले, जिनका यश समस्त दिशाओं में व्याप्त है।

श्लोक 2

खं खं खं खड्गहस्तं विषज्वरहरणं वेदवेदाङ्गदीपं खं खं खं खड्गरूपं त्रिभुवननिलयं देवतासुप्रकाशम् खं खं खं कल्पवृक्षं मणिमयमुकुटं मायया मायरूपं खं खं खं कालचक्रं सकलदिशियशं रामदूतं नमामि २॥

Kham Kham Kham Khadgahastam Vishajvaraharanam Veda-Vedanga-Dipam Kham Kham Kham Khadgarupam Tribhuvananilayam Devata-Suprakasham | Kham Kham Kham Kalpavriksham Manimaya-Mukutam Mayaya Mayarupam Kham Kham Kham Kalachakram Sakala-Dishi-Yasham Ramadutam Namami || 2||

अर्थ:'खं खं खं' का जप करते हुए मैं रामदूत को प्रणाम करता हूँ — हाथ में खड्ग धारण करने वाले, विष एवं ज्वर के हरण करने वाले, वेद-वेदाङ्ग के दीपक; खड्ग रूप, त्रिभुवन के निवास, देवताओं में सुप्रकाशित; मणिमय मुकुट धारण कल्पवृक्ष, माया से कोई भी रूप धारण करने वाले, कालचक्र स्वरूप, जिनका यश समस्त दिशाओं में व्याप्त है।

श्लोक 3

इं इं इं इन्द्रवन्द्यं जलनिधिकलनं सौम्यसाम्राज्यलाभं इं इं इं सिद्धियोगं नतजनसदयं आर्यपूज्यार्चिताङ्गम् इं इं इं सिंहनादं अमृतकरतलं आद्यन्तप्रकाशं इं इं इं चित्स्वरूपं सकलदिशियशं रामदूतं नमामि ३॥

Im Im Im Indravandyam Jalanidhikalanam Saumya-Samrajya-Labham Im Im Im Siddhiyogam Natajanasadayam Arya-Pujyarchitangam | Im Im Im Simhanadam Amritakaratalam Adyanta-Prakasham Im Im Im Chitsvarupam Sakala-Dishi-Yasham Ramadutam Namami || 3||

अर्थ:'इं इं इं' का जप करते हुए मैं रामदूत को प्रणाम करता हूँ — इन्द्र से वन्दित, समुद्र को लाँघने वाले, सौम्य साम्राज्य प्राप्त करने वाले; सिद्धियोग स्वरूप, नतजनों पर दयालु, आर्यजनों से पूजित अङ्ग वाले; सिंहनाद करने वाले, करतल में अमृत वाले, आदि-अन्त में प्रकाशमान, चित्स्वरूप, जिनका यश समस्त दिशाओं में व्याप्त है।

श्लोक 4

सं सं सं साक्षिभूतं विकसितवदनं पिङ्गलाक्षं सुरक्षं सं सं सं सत्यगीतं सकलमुनिनुतं शास्त्रसम्पत्करीयम् सं सं सं सामवेदं निपुणसुललितं नित्यतत्त्वस्वरूपं सं सं सं सावधानं सकलदिशियशं रामदूतं नमामि ४॥

Sam Sam Sam Sakshibhutam Vikasitavadanam Pingalaksham Suraksham Sam Sam Sam Satyagitam Sakalamuninutam Shastra-Sampatkariyam | Sam Sam Sam Samavedam Nipuna-Sulalitam Nitya-Tattva-Svarupam Sam Sam Sam Savadhanam Sakala-Dishi-Yasham Ramadutam Namami || 4||

अर्थ:'सं सं सं' का जप करते हुए मैं रामदूत को प्रणाम करता हूँ — समस्त के साक्षी, विकसित मुख एवं पिङ्गल नेत्र वाले, सुरक्षक; सत्यगीत वाले, समस्त मुनियों से स्तुत, शास्त्र-सम्पत्ति देने वाले; सामवेद के ज्ञाता, निपुण एवं सुललित, नित्य तत्त्व स्वरूप, सदा सावधान, जिनका यश समस्त दिशाओं में व्याप्त है।

श्लोक 5

हं हं हं हंसरूपं स्फुटविकटमुखं सूक्ष्मसूक्ष्मावतारं हं हं हं अन्तरात्मं रविशशिनयनं रम्यगम्भीरभीमम् हं हं हं अट्टहासं सुरवरनिलयं ऊर्ध्वरोमं करालं हं हं हं हंसहंसं सकलदिशियशं रामदूतं नमामि ५॥

Ham Ham Ham Hamsarupam Sphuta-Vikata-Mukham Sukshma-Sukshmavataram Ham Ham Ham Antaratmam Ravishashinayanam Ramya-Gambhira-Bhimam | Ham Ham Ham Attahasam Suravaranilayam Urdhvaromam Karalam Ham Ham Ham Hamsahamsam Sakala-Dishi-Yasham Ramadutam Namami || 5||

अर्थ:'हं हं हं' का जप करते हुए मैं रामदूत को प्रणाम करता हूँ — हंस स्वरूप, स्पष्ट विकट मुख वाले, अवतारों में सूक्ष्म से सूक्ष्म; अन्तरात्मा, सूर्य-चन्द्र रूपी नेत्रों वाले, रमणीय, गम्भीर एवं भीम; अट्टहास करने वाले, देवों के बीच निवास करने वाले, ऊर्ध्व रोम वाले, कराल, हंसों के हंस, जिनका यश समस्त दिशाओं में व्याप्त है।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

रं रं रं🔊ram ram ramअग्नि/राम का बीजाक्षर 'रं', आवाहन एवं रक्षा हेतु पुनरुच्चारित
रक्तवर्णं🔊raktavarnamरक्तवर्ण (लाल) वाले
दिनकरवदनं🔊dinakaravadanamसूर्य के समान तेजस्वी मुख वाले
तीक्ष्णदंष्ट्राकरालं🔊tikshna-damshtra-karalamतीक्ष्ण बाहर निकली दाढ़ों से भयंकर
गिरिचलनकरं🔊girichalanakaramजिनका हाथ पर्वतों को हिला सकता है
राक्षसान्तं🔊rakshasantamराक्षसों का अन्त (नाश) करने वाले
रामदूतं नमामि🔊ramadutam namamiराम के दूत (सन्देशवाहक) को मैं प्रणाम करता हूँ
खं खं खं🔊kham kham khamबीजाक्षर 'खं', पुनरुच्चारित
खड्गहस्तं🔊khadgahastamहाथ में खड्ग धारण करने वाले
विषज्वरहरणं🔊vishajvaraharanamविष एवं ज्वर के हरण करने वाले
कल्पवृक्षं🔊kalpavrikshamकल्पवृक्ष (समस्त इच्छाएँ पूर्ण करने वाले)
इं इं इं🔊im im imबीजाक्षर 'इं', पुनरुच्चारित
इन्द्रवन्द्यं🔊indravandyamइन्द्र से भी वन्दित
जलनिधिकलनं🔊jalanidhikalanamजिन्होंने समुद्र को नापा (लाँघा)
सिद्धियोगं🔊siddhiyogamसिद्धियोग के साक्षात् स्वरूप (योग-सिद्धि)
सं सं सं🔊sam sam samबीजाक्षर 'सं', पुनरुच्चारित
साक्षिभूतं🔊sakshibhutamसमस्त के साक्षी
पिङ्गलाक्षं🔊pingalakshamपिङ्गल (तपे सोने जैसे भूरे) नेत्रों वाले
सामवेदं🔊samavedamसामवेद के ज्ञाता (पवित्र गान में निपुण)
हं हं हं🔊ham ham hamहनुमान/वायु का बीजाक्षर 'हं', पुनरुच्चारित
हंसरूपं🔊hamsarupamहंस (परम आत्मा) के स्वरूप वाले
रविशशिनयनं🔊ravishashinayanamसूर्य एवं चन्द्र रूपी नेत्रों वाले
अट्टहासं🔊attahasamअट्टहास (प्रचण्ड हास्य) वाले

श्री आञ्जनेय स्तोत्रम् (रामदूत स्तोत्रम्) पाठ के लाभ

नकारात्मक शक्तियों, काले जादू, दुष्ट आत्माओं तथा श्लोकों में नामित सात वेतालों से प्रबल रक्षा प्रदान करता है।

बार-बार आने वाले बीजाक्षर (रं, खं, इं, सं, हं) पाठ को मन्त्र-शक्ति से आवेशित करते हैं।

पारम्परिक रूप से विष, ज्वर तथा दीर्घकालीन रोगों (विषज्वर-हरणम्) की निवृत्ति के लिए आवाहित किया जाता है।

साहस, निर्भयता तथा शत्रुओं एवं बाधाओं पर विजय प्रदान करता है।

श्रीराम के प्रति भक्ति को उनके परम सेवक रामदूत के माध्यम से दृढ़ करता है।

हनुमान के अन्तरात्मा (आन्तरिक स्व) एवं शुद्ध चैतन्य रूप के प्रति जागरूकता जगाता है।

श्री आञ्जनेय स्तोत्रम् (रामदूत स्तोत्रम्) जप विधि

जप संख्या11बार
उत्तम समयमंगलवार एवं शनिवार प्रातः, अथवा सन्ध्या समय; विशेषकर हनुमान जयन्ती के अवसर पर तथा रक्षा की कामना के समय।

स्नान करके श्री हनुमान की प्रतिमा के समक्ष, यथासम्भव दीप जलाकर बैठें। पाँचों श्लोकों का स्पष्ट पाठ करें, आरम्भ के बीजाक्षरों (रं, खं, इं, सं, हं) को विशेष रूप से उच्चारित करें तथा प्रत्येक श्लोक का समापन 'रामदूतं नमामि' से करें। एक सामान्य प्रथा मंगलवार अथवा शनिवार को ग्यारह बार पाठ करने की है। लाल पुष्प, सिन्दूर तथा यदि सम्भव हो तो माला अर्पित करें; अन्त में रक्षा एवं बल की प्रार्थना करके समापन करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यह भगवान हनुमान (आञ्जनेय) की पाँच श्लोकों की संस्कृत स्तुति है, जिसमें प्रत्येक श्लोक एक बीजाक्षर — रं, खं, इं, सं, हं — की पुनरावृत्ति से आरम्भ होता है और 'रामदूतं नमामि', अर्थात् 'मैं राम के दूत को प्रणाम करता हूँ', से समाप्त होता है। यह रक्षा के लिए प्रसिद्ध एक बीज-आवेशित स्तोत्र है।
वे अक्षर बीज-मन्त्र (बीज-ध्वनियाँ) हैं। प्रत्येक श्लोक के आरम्भ में रं, खं, इं, सं और हं की पुनरावृत्ति पाठ को मन्त्र-शक्ति से भर देती है, जिससे स्तोत्र रक्षा तथा बाधाओं एवं पीड़ाओं को दूर करने में विशेष प्रभावी हो जाता है।
इसका पाठ नकारात्मक एवं अदृश्य शक्तियों से रक्षा, साहस एवं विजय के लिए, तथा पारम्परिक रूप से विष, ज्वर एवं रोगों की निवृत्ति के लिए किया जाता है, क्योंकि श्लोक हनुमान को विषज्वर (विष-ज्वर) के हर्ता के रूप में वर्णित करते हैं।
रामदूत का अर्थ है 'राम के दूत अथवा सन्देशवाहक' — हनुमान का एक प्रिय नाम, जो श्रीराम की अँगूठी एवं सन्देश लंका में सीता तक ले गए और उनके समर्पित दूत के रूप में सेवा की।

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