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आपदुद्धारक हनुमत् स्तोत्रम्

🕉️ hindu·📿 1× जप·🕐 प्रातःकाल (प्रदोषे वा प्रभाते) एवं सायंकाल; मंगलवार एवं शनिवार को; अथवा किसी भी संकट में तुरन्त·📜 Sri Sudarshana Samhita

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अर्थ

आपदुद्धारक हनुमत् स्तोत्रम् — 'समस्त आपत्तियों से उद्धार करने वाले हनुमान का स्तोत्र' — विभीषण द्वारा रचित एवं श्रीसुदर्शनसंहिता में संरक्षित एक प्रसिद्ध संस्कृत प्रार्थना है। विनियोग एवं संजीवनी पर्वत धारण किये हनुमान का चित्रण करने वाले दो ध्यान-श्लोकों के पश्चात् यह उन्हें प्रत्येक पीड़ा — आधि, व्याधि, महामारी, ग्रहपीड़ा, शत्रु एवं आकस्मिक उत्पात — का नाशक कहकर प्रणाम करता है। यह वचन देता है कि जो हनुमान का स्मरण करते हैं उन्हें कारागार, यात्रा, संग्राम, जल, अग्नि अथवा वन में 'कहीं भी विपत्ति नहीं' होती तथा वे विजय, धन एवं कीर्ति प्राप्त करते हैं।

उत्पत्ति और कथा

Sri Sudarshana Samhita · Vibhishana (brother of Ravana, devotee of Rama) · Traditional (Puranic/Samhita literature)

यह स्तोत्र विभीषण को आरोपित है एवं श्रीसुदर्शनसंहिता में संरक्षित है। विभीषण, जिन्होंने रामायण युद्ध में हनुमान के असंख्य उद्धारों को देखा था — सर्वोपरि लक्ष्मण के प्राण बचाने हेतु संजीवनी पर्वत लाना — उन्होंने हनुमान को संकट के परम हर्ता के रूप में यह स्तोत्र रचा। ध्यान-श्लोक हनुमान को एक हाथ में पर्वत एवं दूसरे में शत्रुनाशक अस्त्र धारण किये हुए चित्रित करते हैं, जो उनकी आरोग्यदाता एवं रक्षक — दोनों भूमिकाओं को दर्शाता है। अन्तिम श्लोक एक फलश्रुति हैं जो उन अनेक आपत्तियों को गिनाते हैं जिनसे भक्त मुक्त होता है।

शास्त्रों में वर्णित

इस स्तोत्र के पीछे सबसे प्रसिद्ध कार्य है हनुमान का सम्पूर्ण संजीवनी पर्वत आकाश-मार्ग से उठाकर ले जाना ताकि इन्द्रजित के शक्ति-अस्त्र से मरणासन्न घायल लक्ष्मण को पुनर्जीवित किया जा सके। चूँकि हनुमान ने इस प्रकार सचमुच प्राण को मृत्यु के मुख से बचाया, अतः भक्त इस 'आपदुद्धारक' स्तोत्र पर विश्वास करते हैं कि यह उन्हें गहनतम संकटों से उबारेगा, एवं इसके श्लोक वचन देते हैं कि जो उनका स्मरण करते हैं उन्हें 'कहीं भी विपत्ति नहीं' होती।

सम्पूर्ण पाठ अर्थ सहित

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श्लोक 1

अस्य श्रीआपदुद्धारक हनुमत्स्तोत्रमहामन्त्रस्य, विभीषण ऋषिः, हनुमान् देवता, सर्वापदुद्धारक श्रीहनुमत्प्रसादेन मम सर्वापन्निवृत्त्यर्थे, सर्वकार्यानुकूल्यसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः।

Om asya shree-aapaduddhaaraka-hanumat-stotra-mahaamantrasya, vibheeshana rishih, hanumaan devataa, sarvaapaduddhaaraka shree-hanumat-prasaadena mama sarvaapan-nivrittyarthe, sarvakaaryaanukoolya-siddhyarthe jape viniyogah.

अर्थ:ॐ। इस 'आपदुद्धारक हनुमत्स्तोत्र' नामक महामन्त्र के विभीषण ऋषि हैं, हनुमान देवता हैं; समस्त आपत्तियों से उद्धार करने वाले श्रीहनुमान की कृपा से मेरी समस्त आपत्तियों के निवारण एवं समस्त कार्यों की अनुकूलता-सिद्धि के लिये जप में इसका विनियोग किया जाता है।

श्लोक 2

वामे करे वैरिभिदं वहन्तं शैलं परे शृङ्खलहारिटङ्कम्। ददानमच्छच्छविमञ्जनाभं भजे ज्वलत्कुण्डलमाञ्जनेयम्॥१॥

Vaame kare vairibhidam vahantam, Shailam pare shrinkhalahaaritankam, Dadaanam acchacchavim anjanaabham, Bhaje jvalat-kundalam aanjaneyam. (1)

अर्थ:जो बायें हाथ में शत्रुओं का विदारण करने वाला (अस्त्र) तथा दूसरे हाथ में पर्वत (संजीवनी) धारण किये हुए हैं, जो उज्ज्वल शिला धारण करते हैं, जिनकी कान्ति निर्मल एवं अंजन के समान श्याम है — ऐसे प्रज्वलित कुण्डलों वाले आञ्जनेय का मैं भजन करता हूँ।

श्लोक 3

संवीतकौपीनमुदञ्चितागुं समुज्ज्वलन्मौञ्जिमथोपवीतम्। सकुण्डलं लम्बिशिखासमेतं तमाञ्जनेयं शरणं प्रपद्ये॥२॥

Samveeta-kaupeenam udanchitaagum, Samujjvalan-maunjim athopaveetam, Sakundalam lambi-shikhaa-sametam, Tam aanjaneyam sharanam prapadye. (2)

अर्थ:कौपीन धारण किये हुए, ऊर्ध्व अंगों वाले, देदीप्यमान मौञ्जी (मेखला) एवं यज्ञोपवीत से युक्त, कुण्डलधारी एवं लम्बी शिखा वाले उन आञ्जनेय की मैं शरण लेता हूँ।

श्लोक 4

आपन्नाखिललोकार्तिहारिणे श्रीहनूमते। अकस्मादागतोत्पातनाशनाय नमो नमः॥३॥

Aapannaakhila-lokaarti-haarine shree-hanoomate, Akasmaad-aagatotpaata-naashanaaya namo namah. (3)

अर्थ:समस्त आपत्तिग्रस्त लोकों की पीड़ा हरने वाले श्रीहनुमान को, अकस्मात् आये उत्पातों का नाश करने वाले को बारम्बार प्रणाम।

श्लोक 5

सीतावियुक्तश्रीरामशोकदुःखभयापह। तापत्रितयसंहारिन्नाञ्जनेय नमोऽस्तु ते॥४॥

Seetaaviyukta-shreeraama-shoka-duhkha-bhayaapaha, Taapatritaya-samhaarinn-aanjaneya namo'stu te. (4)

अर्थ:सीता से विरह में श्रीराम के शोक, दुःख एवं भय को हरने वाले, तीनों तापों का संहार करने वाले हे आञ्जनेय! आपको प्रणाम है।

श्लोक 6

आधिव्याधिमहामारीग्रहपीडापहारिणे। प्राणापहर्त्रे दैत्यानां रामप्राणात्मने नमः॥५॥

Aadhi-vyaadhi-mahaamaaree-grahapeedaa-pahaarine, Praanaapahartre daityaanaam raamapraanaatmane namah. (5)

अर्थ:आधि, व्याधि, महामारी एवं ग्रहपीड़ा का अपहरण करने वाले, दैत्यों के प्राण हरने वाले, राम के प्राणस्वरूप को प्रणाम।

श्लोक 7

संसारसागरावर्तकर्तव्यभ्रान्तचेतसाम्। शरणागतमर्त्यानां शरण्याय नमोऽस्तु ते॥६॥

Samsaarasaagaraavarta-kartavya-bhraantachetasaam, Sharanaagata-martyaanaam sharanyaaya namo'stu te. (6)

अर्थ:संसार-सागर के आवर्त में कर्तव्य से भ्रान्तचित्त, शरणागत मनुष्यों के शरण्य आपको प्रणाम है।

श्लोक 8

वज्रदेहाय कालाग्निरुद्रायामिततेजसे। ब्रह्मास्त्रस्तम्भनायास्मै नमः श्रीरुद्रमूर्तये॥७॥

Vajradehaaya kaalaagni-rudraayaamitatejase, Brahmaastra-stambhanaayaasmai namah shree-rudramoortaye. (7)

अर्थ:वज्रदेह वाले, कालाग्निरुद्र स्वरूप, अमित तेज वाले, ब्रह्मास्त्र का स्तम्भन करने वाले — इन रुद्रमूर्ति को प्रणाम।

श्लोक 9

रामेष्टं करुणापूर्णं हनूमन्तं भयापहम्। शत्रुनाशकरं भीमं सर्वाभीष्टप्रदायकम्॥८॥

Raameshtam karunaapoornam hanoomantam bhayaapaham, Shatru-naashakaram bheemam sarvaabheeshta-pradaayakam. (8)

अर्थ:राम के प्रिय, करुणापूर्ण, भय हरने वाले, शत्रुनाशक, भीम (भयंकर) एवं समस्त अभीष्ट प्रदान करने वाले हनुमान को —

श्लोक 10

कारागृहे प्रयाणे वा सङ्ग्रामे शत्रुसङ्कटे। जले स्थले तथाऽऽकाशे वाहनेषु चतुष्पथे॥९॥

Kaaraagrihe prayaane vaa sangraame shatrusankate, Jale sthale tathaa''kaashe vaahaneshu chatushpathe. (9)

अर्थ:कारागार में, यात्रा में, संग्राम में, शत्रु-संकट में, जल में, स्थल में, आकाश में, वाहनों में, चौराहे पर —

श्लोक 11

गजसिंहमहाव्याघ्रचोरभीषणकानने। ये स्मरन्ति हनूमन्तं तेषां नास्ति विपत् क्वचित्॥१०॥

Gaja-simha-mahaavyaaghra-chora-bheeshana-kaanane, Ye smaranti hanoomantam teshaam naasti vipat kvachit. (10)

अर्थ:हाथी, सिंह, महाव्याघ्र एवं चोरों से भयंकर वन में — जो हनुमान का स्मरण करते हैं, उन्हें कहीं भी विपत्ति नहीं होती।

श्लोक 12

सर्ववानरमुख्यानां प्राणभूतात्मने नमः। शरण्याय वरेण्याय वायुपुत्राय ते नमः॥११॥

Sarva-vaanara-mukhyaanaam praanabhootaatmane namah, Sharanyaaya varenyaaya vaayuputraaya te namah. (11)

अर्थ:समस्त वानरश्रेष्ठों के प्राणस्वरूप को प्रणाम; शरण्य, वरेण्य पवनपुत्र आपको प्रणाम है।

श्लोक 13

प्रदोषे वा प्रभाते वा ये स्मरन्त्यञ्जनासुतम्। अर्थसिद्धिं जयं कीर्तिं प्राप्नुवन्ति संशयः॥१२॥

Pradoshe vaa prabhaate vaa ye smaranty-anjanaasutam, Arthasiddhim jayam keertim praapnuvanti na samshayah. (12)

अर्थ:जो सायंकाल अथवा प्रातःकाल अंजनापुत्र का स्मरण करते हैं, वे अर्थसिद्धि, विजय एवं कीर्ति प्राप्त करते हैं — इसमें सन्देह नहीं।

श्लोक 14

जप्त्वा स्तोत्रमिदं मन्त्रं प्रतिवारं पठेन्नरः। राजस्थाने सभास्थाने प्राप्ते वादे लभेज्जयम्॥१३॥

Japtvaa stotram idam mantram prativaaram pathennarah, Raajasthaane sabhaasthaane praapte vaade labhejjayam. (13)

अर्थ:इस स्तोत्र-मन्त्र का जप कर जो मनुष्य प्रत्येक बार इसका पाठ करता है, वह राजसभा में, सभास्थान में अथवा वाद आ पड़ने पर विजय प्राप्त करता है।

श्लोक 15

विभीषणकृतं स्तोत्रं यः पठेत् प्रयतो नरः। सर्वापद्भ्यो विमुच्येत नात्र कार्या विचारणा॥१४॥

Vibheeshanakritam stotram yah pathet prayato narah, Sarvaapadbhyo vimuchyeta naatra kaaryaa vichaaranaa. (14)

अर्थ:विभीषण द्वारा रचित इस स्तोत्र का जो संयमी मनुष्य पाठ करता है, वह समस्त आपत्तियों से मुक्त हो जाता है — इसमें विचार करने की आवश्यकता नहीं।

श्लोक 16

मर्कटेश महोत्साह सर्वशोकनिवारक। शत्रून् संहर मां रक्ष श्रियं दापय भो हरे॥१५॥

Markateesha mahotsaaha sarvashoka-nivaaraka, Shatroon samhara maam raksha shriyam daapaya bho hare. (15)

अर्थ:हे महान् उत्साह वाले वानरेश! हे समस्त शोक का निवारण करने वाले! मेरे शत्रुओं का संहार करो, मेरी रक्षा करो एवं मुझे श्री (समृद्धि) प्रदान करो, हे हरि (हनुमान)!

श्लोक 17

इति श्रीसुदर्शनसंहितायां विभीषणकृतं सर्वापदुद्धारकं श्रीहनुमत्स्तोत्रं सम्पूर्णम्

Iti shree-sudarshana-samhitaayaam vibheeshanakritam sarvaapaduddhaarakam shree-hanumat-stotram sampoornam.

अर्थ:इस प्रकार श्रीसुदर्शनसंहिता में विभीषणकृत सर्वापदुद्धारक श्रीहनुमत्स्तोत्र सम्पूर्ण हुआ।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

आपदुद्धारक🔊aapad-uddhaarakaआपत्तियों से उद्धार करने वाले, संकट से रक्षक (आपद् = विपत्ति, उद्धारक = उठाने/रक्षा करने वाले)
विनियोगः🔊viniyogahविनियोग / अनुष्ठानिक प्रयोग (पाठ के आरम्भ में मन्त्र का)
विभीषण ऋषिः🔊vibheeshana rishihविभीषण इस स्तोत्र के ऋषि हैं
वामे करे🔊vaame kareबायें हाथ में
वैरिभिदम्🔊vairi-bhidamजो शत्रुओं का विदारण/नाश करता है
शैलं वहन्तम्🔊shailam vahantamपर्वत (संजीवनी) धारण किये हुए
भजे ज्वलत्कुण्डलमाञ्जनेयम्🔊bhaje jvalat-kundalam aanjaneyamप्रज्वलित कुण्डलों वाले आञ्जनेय (अंजना-पुत्र) का मैं भजन करता हूँ
शरणं प्रपद्ये🔊sharanam prapadyeमैं शरण लेता हूँ
आपन्नाखिललोकार्तिहारिणे🔊aapanna-akhila-loka-aarti-haarineसमस्त आपत्तिग्रस्त लोकों की पीड़ा हरने वाले को
अकस्मादागतोत्पातनाशनाय🔊akasmaad-aagata-utpaata-naashanaayaअकस्मात् आये उत्पातों/अपशकुनों का नाश करने वाले को
नमो नमः🔊namo namahबारम्बार प्रणाम
तापत्रितयसंहारिन्🔊taapa-tritaya-samhaarinहे तीनों तापों (आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक) का संहार करने वाले
आधिव्याधिमहामारीग्रहपीडापहारिणे🔊aadhi-vyaadhi-mahaamaaree-grahapeedaa-pahaarineआधि, व्याधि, महामारी एवं ग्रहपीड़ा का अपहरण करने वाले को
रामप्राणात्मने🔊raama-praanaatmaneराम के प्राणस्वरूप/आत्मस्वरूप को
शरणागतमर्त्यानां शरण्याय🔊sharanaagata-martyaanaam sharanyaayaशरणागत मनुष्यों के शरण्य को
वज्रदेहाय🔊vajra-dehaayaवज्र के समान कठोर देह वाले को
ब्रह्मास्त्रस्तम्भनाय🔊brahmaastra-stambhanaayaजो ब्रह्मास्त्र का भी स्तम्भन/निवारण कर सकते हैं उन्हें
रामेष्टम्🔊raama-ishtamराम के प्रिय / राम को प्रिय
सर्वाभीष्टप्रदायकम्🔊sarva-abheeshta-pradaayakamसमस्त अभीष्ट वस्तुओं के प्रदाता
कारागृहे प्रयाणे🔊kaaraagrihe prayaaneकारागार में अथवा यात्रा करते समय
ये स्मरन्ति हनूमन्तम्🔊ye smaranti hanoomantamजो हनुमान का स्मरण करते हैं
तेषां नास्ति विपत् क्वचित्🔊teshaam naasti vipat kvachitउन्हें कहीं भी विपत्ति नहीं होती
अर्थसिद्धिं जयं कीर्तिम्🔊artha-siddhim jayam keertimअर्थसिद्धि (धन/लक्ष्य की प्राप्ति), विजय एवं कीर्ति
सभास्थाने प्राप्ते वादे लभेज्जयम्🔊sabhaasthaane praapte vaade labhejjayamसभास्थान में अथवा वाद आ पड़ने पर विजय प्राप्त होती है
सर्वापद्भ्यो विमुच्येत🔊sarva-aapadbhyo vimuchyetaसमस्त आपत्तियों से मुक्त हो जाता है
मर्कटेश महोत्साह🔊markateesha mahotsaahaहे वानरेश, महान् उत्साह/पराक्रम वाले

आपदुद्धारक हनुमत् स्तोत्रम् पाठ के लाभ

हर प्रकार की आकस्मिक विपत्ति एवं संकट (आपद्) से उद्धार के लिए विशेष रूप से जपा जाता है

श्लोक वचन देते हैं कि जो हनुमान का स्मरण करते हैं उन्हें 'कहीं भी विपत्ति नहीं' — कारागार, यात्रा, संग्राम, जल, अग्नि अथवा वन में

आधि (मानसिक पीड़ा), व्याधि (रोग), महामारी एवं ग्रहपीड़ा (अशुभ ग्रहों की पीड़ा) को दूर करता है

राजसभा, सभा एवं वाद-विवाद में विजय (वादे लभेज्जयम्) प्रदान करता है — कानूनी एवं महत्त्वपूर्ण मामलों से पूर्व जपा जाता है

प्रातः एवं सायं हनुमान का स्मरण करने वालों को धन (अर्थसिद्धि), सफलता, विजय एवं कीर्ति प्रदान करता है

हनुमान 'ब्रह्मास्त्र-स्तम्भन' कहलाते हैं, अतः सबसे प्रबल अस्त्रों एवं संकटों को भी निष्फल करने वाला माना जाता है

किसी भी आकस्मिक संकट या आपातकाल में हनुमान का साहस एवं निश्चिन्त रक्षा प्रदान करता है

आपदुद्धारक हनुमत् स्तोत्रम् जप विधि

जप संख्या1बार
उत्तम समयप्रातःकाल (प्रदोषे वा प्रभाते) एवं सायंकाल; मंगलवार एवं शनिवार को; अथवा किसी भी संकट में तुरन्त

विनियोग (वह देदीक्षण जो विभीषण को ऋषि एवं हनुमान को देवता बताता है) के पाठ से आरम्भ करें। फिर दोनों ध्यान-श्लोकों पर ध्यान करें, संजीवनी पर्वत धारण किये हुए, प्रज्वलित कुण्डलों से दीप्तिमान हनुमान का दर्शन करते हुए। श्लोक के अनुसार आदर्शतः प्रातः अथवा सायं सम्पूर्ण स्तोत्र का भक्तिपूर्वक पाठ करें। किसी कठिन परिस्थिति — मुकदमा, साक्षात्कार, यात्रा अथवा किसी संकट — का सामना करने से पूर्व इसे विशेष रूप से पढ़ा जाता है, क्योंकि यह विशेष रूप से समस्त आपत्तियों से उद्धार एवं वाद में विजय का वचन देता है। आपातकाल में, इस स्तोत्र द्वारा हनुमान का स्मरण मात्र संकट को दूर करने वाला कहा जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'आपदुद्धारक' 'आपद्' (विपत्ति, संकट, दुर्भाग्य) एवं 'उद्धारक' (उठाने अथवा रक्षा करने वाले) का संयोग है। अतः 'आपदुद्धारक हनुमान' का अर्थ है 'समस्त आपत्तियों से उद्धार करने वाले हनुमान।' यह स्तोत्र हनुमान की भक्तों को हर प्रकार के संकट से उबारने की शक्ति के नाम पर है।
इसकी रचना रावण के भक्त-भ्राता विभीषण ने की एवं यह श्रीसुदर्शनसंहिता में संरक्षित है। आरम्भिक विनियोग स्पष्ट रूप से विभीषण को ऋषि (द्रष्टा) एवं हनुमान को इस मन्त्र-स्तोत्र का देवता बताता है।
इसे सामान्य रक्षा के लिए प्रातः एवं सायं पढ़ा जाता है, तथा विशेष रूप से किसी कठिनाई का सामना करने से पूर्व — मुकदमा, परीक्षा या साक्षात्कार, यात्रा, रोग अथवा आकस्मिक संकट — क्योंकि श्लोक समस्त आपत्तियों से उद्धार एवं राजसभा, सभा एवं वाद में विजय का वचन देते हैं।
ध्यान (ध्यान) श्लोक हनुमान को पर्वत धारण किये हुए वर्णित करता है क्योंकि रामायण के प्रसिद्ध प्रसंग में वे हिमालय जाकर घायल लक्ष्मण को पुनर्जीवित करने हेतु जीवनरक्षक संजीवनी-बूटी सहित सम्पूर्ण संजीवनी पर्वत ले आये थे — यह हनुमान का संकट से उद्धारक रूप का सटीक चित्र है।

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