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श्री अन्नपूर्णा जी की आरती

🕉️ hindu·📿 1× जप·🕐 प्रातः या सायं आरती के समय, विशेषकर अन्नपूर्णा जयन्ती (मार्गशीर्ष पूर्णिमा), अक्षय तृतीया पर और पहला भोजन पकाने/परोसने से पूर्व·📜 Traditional North Indian devotional aarti (Aarti Sangrah); the deity Annapurna is glorified in the Annapurna Stotram attributed to Adi Shankaracharya

अन्य नाम / खोज: barambar pranam karu maharani · om jai annapurna · annapurna mata ki aarti · annapurna devi aarti · maa annapurna aarti

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अर्थ

श्री अन्नपूर्णा जी की आरती माँ अन्नपूर्णा की स्तुति है, जो देवी पार्वती का वह स्वरूप हैं जो समस्त संसार को अन्न और पोषण देती हैं। काशी (वाराणसी) में विश्वनाथ जी के साथ विराजमान, वे हाथ में अन्न का कटोरा और चमचा लिए रहती हैं, जिससे उनका स्मरण करने वाला कोई भक्त भूखा नहीं रहता। भक्त इस आरती को समृद्धि, सम्पन्नता और इस आश्वासन के लिए गाते हैं कि उनके घर में अन्न एवं कृपा की कभी कमी न हो।

उत्पत्ति और कथा

Traditional North Indian devotional aarti (Aarti Sangrah); the deity Annapurna is glorified in the Annapurna Stotram attributed to Adi Shankaracharya · Traditional / Anonymous · Medieval to modern

अन्नपूर्णा, पार्वती का अन्न-दात्री स्वरूप, काशी (वाराणसी) की अधिष्ठात्री देवी हैं, जहाँ उनका मंदिर भगवान काशी विश्वनाथ के मंदिर के पास स्थित है। परम्परा के अनुसार, शिव स्वयं भिक्षापात्र लेकर उनके पास आए ताकि संसार को सिखा सकें कि अन्न और पदार्थ पवित्र हैं, मात्र माया नहीं। उत्तर भारतीय घरों एवं मंदिरों में गायी जाने वाली यह आरती उन्हें उस अक्षय पालनकर्त्री के रूप में महिमामंडित करती है जो सुनिश्चित करती हैं कि कोई भक्त भूखा न रहे।

शास्त्रों में वर्णित

परम्परागत रूप से माना जाता है कि जो श्रद्धापूर्वक अन्नपूर्णा की आराधना करता है, उसकी रसोई में अन्न एवं अनाज कभी कम नहीं होता; स्वयं भगवान शिव, परम तपस्वी, को भी माता से पोषण पाने के लिए भिक्षापात्र लेकर काशी आना पड़ा, जो दर्शाता है कि वे ही समस्त जीवों का पालन करती हैं।

सम्पूर्ण पाठ अर्थ सहित

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श्लोक 1

बारम्बार प्रणाम, करूँ महारानी दया दृष्टि कीजै, हे जगत-जननी जय अन्नपूर्णा, मैया जय अन्नपूर्णा

Baarambaara pranaama, karoon Maharaani Daya drishti keejai, he jagata-janani Om Jai Annapurna, Maiya Jai Annapurna

अर्थ:हे महारानी, बारम्बार मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ; हे जगत-जननी, मुझ पर दया दृष्टि कीजिए। माता अन्नपूर्णा, तुम्हारी जय हो!

श्लोक 2

जगत-जननी जगदम्बा, अन्न-धन देती हो सकल विश्व की माता, सबको पालन करती हो जय अन्नपूर्णा

Jagata-janani Jagadamba, anna-dhana deti ho Sakala vishva ki maata, sabako paalana karti ho Om Jai Annapurna

अर्थ:हे जगत-जननी जगदम्बा, तुम अन्न और धन देती हो; समस्त विश्व की माता, तुम सबका पालन करती हो।

श्लोक 3

काशीपुरी अधिष्ठात्री, विश्वेश्वर प्यारी हाथ कमण्डल त्रिशूल, ज्वालामुखी न्यारी जय अन्नपूर्णा

Kaasheepuri adhishthaatri, Vishveshvara pyaari Haatha kamandala trishoola, jvaalaamukhi nyaari Om Jai Annapurna

अर्थ:काशीपुरी की अधिष्ठात्री और विश्वेश्वर की प्रिया, हाथ में कमण्डल और त्रिशूल धारण किए, तेजोमयी और अद्वितीय।

श्लोक 4

जो जन तुमको ध्यावे, भूखा नहिं रहता रंक होय धनवन्ता, सब कुछ है पाता जय अन्नपूर्णा

Jo jana tumako dhyaave, bhookha nahin rahata Ranka hoya dhanavanta, saba kuchha hai paata Om Jai Annapurna

अर्थ:जो जन तुम्हारा ध्यान करता है, वह कभी भूखा नहीं रहता; रंक भी धनवान बन जाता है और सब कुछ पा लेता है।

श्लोक 5

भक्त-जनों को सुख दे, सम्पति-धन देती भण्डारे भरपूर रहें, यश सब जग गाती जय अन्नपूर्णा

Bhakta-janon ko sukha de, sampati-dhana deti Bhandaare bharapoora rahen, yasha saba jaga gaati Om Jai Annapurna

अर्थ:तुम भक्तजनों को सुख देती हो और सम्पत्ति-धन प्रदान करती हो; उनके भण्डार सदा भरपूर रहें, सारा जग तुम्हारा यश गाता है।

श्लोक 6

शंकर सहित विराजत, मैया जग-तारिणी कर में अन्न-कटोरा, करुणा की खानी जय अन्नपूर्णा

Shankara sahita viraajata, Maiya jaga-taarini Kara mein anna-katora, karuna ki khaani Om Jai Annapurna

अर्थ:शंकर सहित विराजमान, हे जग-तारिणी माता, तुम्हारे कर में अन्न का कटोरा है — तुम करुणा की खान हो।

श्लोक 7

अन्नपूर्णा की आरती, जो कोई नर गावे सुख-सम्पति सब पावे, परम पद पावे जय अन्नपूर्णा, मैया जय अन्नपूर्णा

Annapurna ki aarti, jo koi nara gaave Sukha-sampati saba paave, parama pada paave Om Jai Annapurna, Maiya Jai Annapurna

अर्थ:जो भी मनुष्य अन्नपूर्णा जी की यह आरती गाता है, वह समस्त सुख-सम्पत्ति पाकर परम पद को प्राप्त करता है।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

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बारम्बार प्रणाम🔊baarambaara pranaamaबारम्बार मैं प्रणाम करता हूँ
करूँ महारानी🔊karoon Maharaani(मैं तुम्हें वन्दन करता हूँ) हे महारानी
दया दृष्टि कीजै🔊daya drishti keejaiमुझ पर अपनी करुणामयी दृष्टि डालो
जगत-जननी🔊jagata-jananiहे जगत की माता
अन्न-धन देती हो🔊anna-dhana deti hoतुम अन्न और धन प्रदान करती हो
सबको पालन करती हो🔊sabako paalana karti hoतुम समस्त प्राणियों का पालन-पोषण करती हो
काशीपुरी अधिष्ठात्री🔊Kaasheepuri adhishthaatriकाशी (वाराणसी) नगरी की अधिष्ठात्री देवी
विश्वेश्वर प्यारी🔊Vishveshvara pyaariविश्वेश्वर (काशी के भगवान शिव) की प्रिया
कर में अन्न-कटोरा🔊kara mein anna-katoraअपने हाथ में अन्न का कटोरा धारण किए
करुणा की खानी🔊karuna ki khaaniकरुणा की साक्षात् खान (स्रोत)
जो जन तुमको ध्यावे🔊jo jana tumako dhyaaveजो भी तुम्हारा ध्यान करता है
भूखा नहिं रहता🔊bhookha nahin rahataवह कभी भूखा नहीं रहता
रंक होय धनवन्ता🔊ranka hoya dhanavantaरंक भी धनवान बन जाता है
भण्डारे भरपूर रहें🔊bhandaare bharapoora rahenभण्डार सदा भरे रहें
शंकर सहित विराजत🔊Shankara sahita viraajataभगवान शंकर (शिव) के साथ विराजमान
जग-तारिणी🔊jaga-taariniजगत् की उद्धारिणी
परम पद पावे🔊parama pada paaveपरम पद (मोक्ष) को प्राप्त करता है

श्री अन्नपूर्णा जी की आरती पाठ के लाभ

माँ अन्नपूर्णा का आशीर्वाद आमंत्रित करती है जिससे घर में अन्न की कभी कमी न हो

समृद्धि, सम्पन्नता और सदा भरे भण्डार लाने वाली मानी जाती है

दरिद्रता और भूख का भय दूर करती है; कहा जाता है कि रंक भी सम्पन्न बन जाता है

काशी के शिव (विश्वनाथ) और शक्ति (अन्नपूर्णा) की संयुक्त कृपा लाती है

अन्न के प्रति कृतज्ञता और दूसरों को भोजन कराने (अन्न-दान) की भावना जगाती है

विशेषकर अन्नपूर्णा जयन्ती और अक्षय तृतीया पर अत्यन्त शुभ

सच्चे भक्त को सन्तोष और परम पद की ओर ले जाती है

श्री अन्नपूर्णा जी की आरती जप विधि

जप संख्या1बार
उत्तम समयप्रातः या सायं आरती के समय, विशेषकर अन्नपूर्णा जयन्ती (मार्गशीर्ष पूर्णिमा), अक्षय तृतीया पर और पहला भोजन पकाने/परोसने से पूर्व

माँ अन्नपूर्णा की छवि या मूर्ति के समक्ष जलते हुए घी या कपूर के दीप से यह आरती अर्पित करें। अनेक भक्त देवी के समक्ष ताजा पकाया भोजन (भोग) या अन्न अर्पित करते हैं और बाद में उसे प्रसाद रूप में वितरित करते हैं। दीप को घड़ी की दिशा में घुमाते हुए और घण्टी बजाते हुए भक्तिपूर्वक गाएँ। रसोई में देवी के अंश रूप कुछ अन्न रखना और पूजा के पश्चात् भूखे को भोजन कराना (अन्न-दान) परम्परा है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अन्नपूर्णा देवी पार्वती का वह स्वरूप हैं जो अन्न एवं पोषण की दात्री हैं ('अन्न' अर्थात् भोजन, 'पूर्णा' अर्थात् पूर्ण)। वे काशी (वाराणसी) की रानी हैं, जो हाथ में खीर का कटोरा और सुनहरा चमचा लिए दर्शायी जाती हैं, और भगवान शिव के विश्वनाथ रूप की पत्नी हैं।
कहा जाता है कि जब शिव ने भौतिक जगत् को मात्र माया घोषित किया, तब समस्त शरीरों की पालनकर्त्री पार्वती अन्तर्धान हो गईं, और संसार भूखा मरने लगा। यह जानकर कि अन्न और पदार्थ वास्तविक एवं पवित्र हैं, शिव स्वयं भिक्षापात्र लेकर काशी आए, और पार्वती अन्नपूर्णा रूप में उन्हें भोजन कराने प्रकट हुईं — इस प्रकार वे समस्त प्राणियों की शाश्वत पालनकर्त्री के रूप में स्थापित हुईं।
यह अन्नपूर्णा मंदिरों में प्रतिदिन गायी जाती है, और विशेष भक्ति के साथ अन्नपूर्णा जयन्ती (मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा) पर तथा अक्षय तृतीया पर, जो अक्षय समृद्धि से सम्बन्धित है।
यह अन्न को एक दिव्य उपहार के रूप में कृतज्ञता सिखाती है और भक्तों को स्मरण कराती है कि जो माता हमारी थाली भरती हैं, वही समस्त ब्रह्माण्ड को भरती हैं। अन्नपूर्णा की आराधना स्वाभाविक रूप से अन्न-दान — दूसरों को भोजन कराने — की प्रेरणा देती है, जो दान के सर्वोच्च रूपों में से एक माना जाता है।

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