श्रीमद्भगवद्गीता ११.९ — एवमुक्त्वा ततो राजन्
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✦ अर्थ
संजय द्वारा राजा धृतराष्ट्र से कहा गया यह महत्त्वपूर्ण श्लोक उस क्षण को अंकित करता है जब श्रीकृष्ण अपना विश्वरूप प्रकट करते हैं। अपनी दिव्य महिमा दिखाने का वचन देकर और अर्जुन को दिव्यचक्षु प्रदान करके, महायोगेश्वर कहे जाने वाले श्रीहरि अपना परम, सर्वव्यापी रूप अनावृत करते हैं। यह ग्यारहवें अध्याय के सर्वाधिक विस्मयकारी दर्शन की देहली है।
उत्पत्ति और कथा
Bhagavad Gita Chapter 11, Verse 9 · Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva) · Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)
ग्यारहवें अध्याय, विश्वरूपदर्शनयोग, में श्रीकृष्ण अपनी दिव्य महिमा दिखाने का वचन देकर और अर्जुन को दिव्यचक्षु प्रदान करने के पश्चात्, संजय धृतराष्ट्र को उस निर्णायक क्षण का वर्णन करते हैं: महायोगेश्वर श्रीहरि ने अर्जुन को अपना परम, ऐश्वर्यमय विश्वरूप दिखाया — वही दर्शन जो इस अध्याय को परिभाषित करता है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
परम्परा मानती है कि इस परम रूप में श्रीकृष्ण ने सम्पूर्ण सृष्टि को अपने भीतर समाहित दिखाया, एक ऐसा दर्शन जिसकी महिमा इतनी थी कि उसे केवल दिव्य नेत्र से और महायोगेश्वर की कृपा से ही देखा जा सकता था।
मंत्र
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सञ्जय उवाच एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः। दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम्॥
sañjaya uvācha evam uktvā tato rājan mahā-yogeśhvaro hariḥ darśhayām āsa pārthāya paramaṁ rūpam aiśhwaram
अर्थ:संजय ने कहा -- हे राजन्! इस प्रकार कहकर महायोगेश्वर श्रीहरि ने अर्जुन को अपना परम ऐश्वर्यमय (विश्व) रूप दिखाया।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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श्रीमद्भगवद्गीता ११.९ — एवमुक्त्वा ततो राजन् पाठ के लाभ
विश्वरूप के प्रकट होने के पावन क्षण को अंकित करता है
श्रीकृष्ण को महायोगेश्वर, महान् योगेश्वर के रूप में सम्मानित करता है
आगे आने वाले विश्वरूप-दर्शन के लिए हृदय को श्रद्धा से तैयार करता है
स्मरण कराता है कि भगवान अपनी ही कृपा से प्रकट होते हैं
भगवान के परम, ऐश्वर्यमय रूप के प्रति विस्मय जगाता है
विश्वरूप के चिन्तन का शुभारम्भ करने के लिए एक उपयुक्त श्लोक
श्रीमद्भगवद्गीता ११.९ — एवमुक्त्वा ततो राजन् जप विधि
इस श्लोक का जप श्रीकृष्ण के विश्वरूप के चिन्तन के द्वार के रूप में करें। जप करते हुए मन में रखें कि महान् योगेश्वर अपनी परम महिमा प्रकट करने वाले हैं, और अध्याय 11 में आगे आने वाले दर्शन के प्रति श्रद्धा और भक्ति से जाएँ। यह विश्वरूप के अनावरण से पूर्व मन को विस्मय में स्थिर करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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