काशी पञ्चकम्
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✦ अर्थ
काशी पञ्चकम् आदि शंकराचार्य रचित काशी (वाराणसी) पर पाँच श्लोकों का स्तोत्र है। यह पवित्र नगरी को केवल स्थान नहीं, अपितु चेतना का अंतर-आसन बताता है — मन का शमन ही काशी और ज्ञान का प्रकाश उसकी नित्य गंगा है। भक्तिपूर्वक नित्य पाठ के लिए उपयुक्त।
उत्पत्ति और कथा
Ascribed to Adi Shankaracharya · Adi Shankaracharya · Classical
काशी पञ्चकम् पारंपरिक रूप से आदि शंकराचार्य को आरोपित है। आदि शंकराचार्य के काशी (वाराणसी) पर ये पाँच श्लोक पवित्र नगरी को केवल स्थान नहीं अपितु चेतना का अंतर-आसन बताते हैं: मन का शमन ही काशी है, और ज्ञान का प्रकाश उसकी नित्य गंगा।
✦ शास्त्रों में वर्णित
कहा जाता है कि सच्चे और भक्तिपूर्ण हृदय से काशी पञ्चकम् का पाठ करना दिव्य कृपा के निकट पहुँचना है, जो प्रेम से पुकारने वालों को कभी नहीं त्यागती।
मंत्र
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मनोनिवृत्तिः परमोपशान्तिः सा तीर्थवर्या मणिकर्णिका च । ज्ञानप्रवाहा विमलादिगङ्गा सा काशिकाहं निजबोधरूपा ॥ १॥ यस्यामिदं कल्पितमिन्द्रजालं चराचरं भाति मनोविलासम् । सच्चित्सुखैका परमात्मरूपा सा काशिकाहं निजबोधरूपा ॥ २॥ इन्द्रवज्रा छन्द - कोशेषु पञ्चस्वधिराजमाना बुद्धिर्भवानी प्रतिदेहगेहम् । साक्षी शिवः सर्वगतोऽन्तरात्मा सा काशिकाहं निजबोधरूपा ॥ ३॥ अनुष्टुप् छन्द - काश्यां हि काश्यते काशी काशी सर्वप्रकाशिका । सा काशी विदिता येन तेन प्राप्ता हि काशिका ॥ ४॥ स्रग्धरा छन्द - काशीक्षेत्रं शरीरं त्रिभुवन-जननी व्यापिनी ज्ञानगङ्गा । भक्तिः श्रद्धा गयेयं निजगुरु-चरणध्यानयोगः प्रयागः । विश्वेशोऽयं तुरीयः सकलजन-मनःसाक्षिभूतोऽन्तरात्मा देहे सर्वं मदीये यदि वसति पुनस्तीर्थमन्यत्किमस्ति ॥ ५॥ इति श्रीमद् शङ्कराचार्यविरचितं काशीपञ्चकं समाप्तम् ।
manonivṛttiḥ paramopaśāntiḥ sā tīrthavaryā maṇikarṇikā ca | jñānapravāhā vimalādigaṅgā sā kāśikāhaṃ nijabodharūpā || 1|| yasyāmidaṃ kalpitamindrajālaṃ carācaraṃ bhāti manovilāsam | saccitsukhaikā paramātmarūpā sā kāśikāhaṃ nijabodharūpā || 2|| indravajrā chanda - kośeṣu pañcasvadhirājamānā buddhirbhavānī pratidehageham | sākṣī śivaḥ sarvagato'ntarātmā sā kāśikāhaṃ nijabodharūpā || 3|| anuṣṭup chanda - kāśyāṃ hi kāśyate kāśī kāśī sarvaprakāśikā | sā kāśī viditā yena tena prāptā hi kāśikā || 4|| sragdharā chanda - kāśīkṣetraṃ śarīraṃ tribhuvana-jananī vyāpinī jñānagaṅgā | bhaktiḥ śraddhā gayeyaṃ nijaguru-caraṇadhyānayogaḥ prayāgaḥ | viśveśo'yaṃ turīyaḥ sakalajana-manaḥsākṣibhūto'ntarātmā dehe sarvaṃ madīye yadi vasati punastīrthamanyatkimasti || 5|| iti śrīmad śaṅkarācāryaviracitaṃ kāśīpañcakaṃ samāptam |
अर्थ:आदि शंकराचार्य के काशी (वाराणसी) पर पाँच श्लोक — जो पवित्र नगरी को केवल स्थान नहीं अपितु चेतना का अंतर्-आसन बताते हैं: मन का शमन ही काशी है, व ज्ञान का प्रकाश उसकी नित्य गंगा।
काशी पञ्चकम् पाठ के लाभ
काशी पञ्चकम् के पाठ से देवता की कृपा, आशीर्वाद और रक्षा प्राप्त होती है, ऐसा माना जाता है।
भक्ति की वृद्धि करता है, मन को शांत करता है और भगवान के स्मरण में हृदय को स्थिर रखता है।
सोमवार को, तथा महाशिवरात्रि और श्रावण मास में सर्वाधिक शुभ।
एक अमूल्य संस्कृत स्तोत्र, श्रद्धापूर्वक नित्य पाठ के लिए उपयुक्त।
काशी पञ्चकम् जप विधि
स्नान करके पूर्व या उत्तर की ओर मुख कर देवता की मूर्ति के सम्मुख बैठें। दीप जलाएँ और काशी पञ्चकम् का धीरे-धीरे भक्तिपूर्वक पाठ करें। इसका नित्य पाठ किया जा सकता है, अथवा विशेषकर सोमवार को तथा महाशिवरात्रि और श्रावण मास में।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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