मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो
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✦ अर्थ
'मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो' सोलहवीं शताब्दी के संत-कवि सूरदास का सबसे प्रिय बाल-लीला पद है, जिसमें माखन-चोरी करते पकड़े गए बालकृष्ण माता यशोदा से अपनी निर्दोषता का दावा करते हैं। यह वात्सल्य भक्ति की मधुरता को समेटे एक कोमल, चंचल भजन है। जन्माष्टमी पर और जहाँ भी बाल गोपाल पूजे जाते हैं, यह गाया जाता है।
उत्पत्ति और कथा
Composed by Surdas (Sur Sagar; 16th-century Braj bhakti tradition) · Surdas · 16th century
ब्रज के नेत्रहीन गायक सूरदास ने कृष्ण के बचपन पर हज़ारों पद गाए। इस सबसे प्रसिद्ध पद में नन्हा कृष्ण, होठों पर माखन लगे हुए, यशोदा के सामने ऐसी अप्रतिरोध्य तर्क-बुद्धि से अपनी निर्दोषता का दावा करता है कि वह केवल मुस्कुराकर उसे गले लगा लेती हैं। यह सभी माखन-चोरी गीतों में सबसे प्रिय है, वात्सल्य भक्ति का सच्चा हृदय माना जाता है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
सूरदास नेत्रहीन थे, फिर भी कृष्ण के बचपन के उनके चित्रण इतने सजीव हैं कि भक्त कहते हैं कि उन्होंने भगवान को अंतर्दृष्टि से अवश्य देखा होगा। गायक और श्रोता दोनों बताते हैं कि यह सरल गीत किस प्रकार ईश्वर से दूरी मिटा देता है — उपासक को एक स्नेही माता-पिता और उस अनंत को इतना छोटा शिशु बना देता है कि उसे गोद में लिया जा सके।
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मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो। ख्याल परै ये सखा सबै मिलि, मेरैं मुख लपटायो॥
Maiya mori main nahin makhan khayo Khyal parai ye sakha sabai mili, merain mukh lapatayo
अर्थ:मैया मेरी, मैंने माखन नहीं खाया! इन सखाओं ने मिलकर मेरे मुँह पर लपेट दिया।
देखि तुही छींके पर भाजन, ऊँचे धरि लटकायो। हौं जु कहत नान्हें कर अपने, मैं कैसें करि पायो॥
Dekhi tuhi chheenke par bhajan, oonche dhari latkayo Haun ju kahat naanhe kar apne, main kaisen kari payo
अर्थ:तू ही देख — छींके पर बर्तन तो ऊँचे लटका हुआ था; और मेरे ये नन्हे हाथ — मैं भला कैसे पा सकता था?
मुख दधि लेपन कर पुनि गोरस, डारि सबनि के आगे। लकुटी कांधे गोधन गैयाँ, चलत भयो पग लागे॥
Mukh dadhi lepan kar puni goras, daari sabani ke aage Lakuti kaandhe godhan gaiyan, chalat bhayo pag laage
अर्थ:(फिर भी) मुख पर दही लपेटे, सबके आगे गोरस ढुलकाकर, कंधे पर लकुटी रखे गायों के संग चल पड़े, नन्हे पग लड़खड़ाते हुए।
सूरदास तब बिहँसि जसोदा, लै उर कंठ लगायो॥
Surdas tab bihansi Jasoda, lai ur kanth lagayo
अर्थ:सूरदास कहते हैं: तब यशोदा हँसकर बालकृष्ण को हृदय से लगा लेती हैं।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो पाठ के लाभ
सूरदास का सबसे प्रिय 'बाल-लीला' पद — बालकृष्ण का माखन-चोरी से निर्दोष इनकार
एक कोमल, चंचल भजन जो वात्सल्य भक्ति (ईश्वर को शिशु रूप में प्रेम) की मधुरता समेटे है
जन्माष्टमी पर और घर-घर में, जहाँ भी बाल कृष्ण की पूजा होती है, गाया जाता है
बाल गोपाल के माधुर्य से मुख पर मुस्कान लाता और हृदय को कोमल बनाता है
सरल ब्रजभाषा के पद, बच्चों और बड़ों दोनों को समान रूप से प्रिय
मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो जप विधि
इसे हल्के और चंचल भाव से गाएँ, नन्हे कृष्ण की शरारत और यशोदा की प्रेममयी मुस्कान की कल्पना करते हुए। यह माधुर्य का भजन है — भगवान की बाल-लीलाओं का आनंद लेने के लिए गाया जाता है, किसी विधि-विधान की आवश्यकता नहीं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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