सुखकर्ता दुःखहर्ता आरती
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✦ अर्थ
सुखकर्ता दुःखहर्ता भगवान गणेश की सर्वाधिक प्रिय आरती है, जिसे संत समर्थ रामदास ने रचा था। इसमें गणेश को सुख देने वाले, दुःख हरने वाले और मंगलमूर्ति के रूप में पूजा जाता है। गणेश चतुर्थी और गणेशोत्सव में यह प्रातः-संध्या गणपति की मूर्ति के समक्ष गाई जाती है।
उत्पत्ति और कथा
Composed by Samarth Ramdas · Samarth Ramdas · 17th century CE
सुखकर्ता दुःखहर्ता आरती की रचना मराठी संत समर्थ रामदास ने की, जिन्होंने अपने युग में मराठा शौर्य की प्रेरणा दी। तीन भक्ति-भरे चरणों में वे गणेश को शेंदुर, मोती और हीरे के मुकुट से अलंकृत निहारते हैं, और स्वयं को 'दास रामाचा' (सेवक रामदास) कहकर प्रभु के द्वार पर खड़े होकर संकट में रक्षा की याचना करते हैं। यह गणेश चतुर्थी की प्राण-आरती बन गई है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
भक्त मानते हैं कि इस आरती का वचन अक्षरशः सत्य है — 'दर्शनमात्रे मनकामना पुरती', अर्थात गणेश के केवल दर्शन मात्र से हृदय की मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं — इसीलिए इसे हर गणेशोत्सव और हर शुभ आरंभ में सबसे पहले गाया जाता है, इस विश्वास के साथ कि प्रभु उनके सामने के विघ्नों को दूर करेंगे।
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सुखकर्ता दुःखहर्ता वार्ता विघ्नाची । नुरवी पुरवी प्रेम कृपा जयाची । सर्वांगी सुंदर उटी शेंदुराची । कंठी झळके माळ मुक्ताफळांची ॥ जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती । दर्शनमात्रे मनकामना पुरती ॥
Sukhakarta duhkhaharta varta vighnachi Nuravi puravi prema kripa jayachi Sarvamgi sumdara uti shemdurachi Kamthi jhalake mala muktaphalamchi Jaya deva jaya deva jaya mamgalamurti Darshanamatre manakamana purati
अर्थ:सुख के कर्ता, दुःख के हर्ता, हर विघ्न को टालने वाले; जिनकी कृपा से भक्त का प्रेम अधूरा नहीं रहता, अपितु पूर्ण होता है। आपका समस्त रूप सुन्दर है, शेंदूर (सिन्दूर) से अलंकृत; आपके कण्ठ पर मोतियों की माला सुशोभित है। जय देव, जय देव, हे मंगलमूर्ति; आपके केवल दर्शन से हृदय की हर कामना पूर्ण होती है।
रत्नखचित फरा तुज गौरीकुमरा । चंदनाची उटी कुंकुमकेशरा । हिरेजडित मुकुट शोभतो बरा । रुणझुणती नूपुरे चरणी घागरिया ॥ जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती । दर्शनमात्रे मनकामना पुरती ॥
Ratnakhachita phara tuja gaurikumara Chamdanachi uti kumkumakeshara Hirejadita mukuta shobhato bara Runajhunati nupure charani ghagariya Jaya deva jaya deva jaya mamgalamurti Darshanamatre manakamana purati
अर्थ:रत्नजड़ित मन्दिर आपके लिए सजाया है, हे गौरीपुत्र; चन्दन, कुंकुम व केसर से अलंकृत। हीरों से जड़ा मुकुट आपको भलीभाँति शोभा देता है; आपके चरणों में पायल मधुर ध्वनि करती है। जय देव, जय देव, हे मंगलमूर्ति; आपके केवल दर्शन से हृदय की हर कामना पूर्ण होती है।
लंबोदर पीतांबर फणिवरवंदना । सरळ सोंड वक्रतुंड त्रिनयना । दास रामाचा वाट पाहे सदना । संकटी पावावे निर्वाणी रक्षावे सुरवरवंदना ॥ जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती । दर्शनमात्रे मनकामना पुरती ॥
Lambodara pitambara phanivaravamdana Sarala somda vakratumda trinayana Dasa ramacha vata pahe sadana Samkati pavave nirvani rakshave suravaravamdana Jaya deva jaya deva jaya mamgalamurti Darshanamatre manakamana purati
अर्थ:हे लम्बोदर, पीताम्बरधारी, नागराज द्वारा पूजित; सीधी सूँड, वक्र दन्त (वक्रतुण्ड) व त्रिनेत्रधारी। आपका सेवक रामदास आपके द्वार पर खड़ा है; संकट में मेरी सहायता कीजिए, अन्तिम समय में रक्षा कीजिए, हे देवों द्वारा पूजित प्रभु। जय देव, जय देव, हे मंगलमूर्ति; आपके केवल दर्शन से हृदय की हर कामना पूर्ण होती है।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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सुखकर्ता दुःखहर्ता आरती पाठ के लाभ
भारत भर में गणेश की सबसे प्रिय आरती, उनकी कृपा पाने, विघ्न दूर करने और मनोकामना पूर्ति हेतु गाई जाती है।
संत समर्थ रामदास द्वारा रचित, यह गणेश को सुखकर्ता-दुःखहर्ता और मंगलमूर्ति के रूप में स्तुति कर भक्ति को गहरा करती है।
माना जाता है कि उनके केवल दर्शन मात्र से हर मनोकामना पूर्ण होती है, और संकट में इसे गाने पर 'निर्वाणी' अर्थात अंतिम क्षण में उनकी रक्षा मिलती है।
गणेश चतुर्थी और गणेशोत्सव की प्रमुख आरती, गणपति की मूर्ति के समक्ष प्रातः-संध्या और किसी भी शुभ कार्य के आरंभ में गाई जाती है।
गणेश चालीसा, गणेश पंचरत्नम् और वक्रतुण्ड महाकाय के साथ इसका पाठ कर गणेश-उपासना पूर्ण की जाती है।
सुखकर्ता दुःखहर्ता आरती जप विधि
गणेश की प्रतिमा या मूर्ति के समक्ष जलते दीप (और कर्पूर) के साथ खड़े होकर, ज्योति को प्रभु के समक्ष धीरे-धीरे घुमाते हुए आरती गाएँ। दूर्वा, लाल पुष्प और मोदक अर्पित करें। यह गणेश चतुर्थी की केंद्रीय आरती है, जो प्रातः-संध्या गाई जाती है और 'गणपति बाप्पा मोरया' के जयघोष से संपन्न होती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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