भो शम्भो शिव शम्भो स्वयम्भो
अन्य नाम / खोज: bho shambho shiva shambho swayambho · bho shambho · gangadhara shankara karunakara · sadashiva brahmendra bho shambho · bho shambho shiva shambho lyrics
अपनी भाषा/लिपि में पढ़ें
✦ अर्थ
'भो शम्भो शिव शम्भो स्वयम्भो' अठारहवीं शताब्दी के अवधूत संत श्री सदाशिव ब्रह्मेन्द्र की प्रिय भक्ति-रचना है। प्रवाहमयी टेक और लघु पदों में रची यह कृति शिव की स्तुति दो रूपों में करती है — एक ओर गंगाधर, संसार-सागर से तारने वाले करुणामय प्रभु के रूप में, और दूसरी ओर निर्गुण परब्रह्म — आकाश सा निराकार, हृदय-गुहा में निहित, आनन्दस्वरूप। यह कर्नाटक संगीत की कृति तथा मुक्ति की अद्वैत प्रार्थना के रूप में व्यापक रूप से गाई जाती है।
उत्पत्ति और कथा
Devotional composition of Sri Sadashiva Brahmendra · Sri Sadashiva Brahmendra Saraswati · 18th century CE
श्री सदाशिव ब्रह्मेन्द्र एक प्रसिद्ध अवधूत एवं अद्वैत आचार्य थे, जो तमिलनाडु में नेरूर के निकट एक भ्रमणशील, प्रायः मौन, ईश्वर-मग्न संत के रूप में रहते थे। उनकी संस्कृत रचनाएँ, जो आज भी कर्नाटक परम्परा में गाई जाती हैं, आत्म-साक्षात्कार के आनन्द को उँडेलती हैं। 'भो शम्भो' में वे शिव को एक साथ कोमल, गंगाधर रक्षक के रूप में पुकारते हैं जो भक्त को जन्म-मृत्यु के सागर से पार ले जाते हैं, और हृदय-गुहा में प्रकाशमान निर्गुण परमात्मा के रूप में — जो उनके अपने अद्वैत साक्षात्कार का लक्ष्य है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
सदाशिव ब्रह्मेन्द्र के एक मौन अवधूत के रूप में चमत्कारी जीवन से अनेक कथाएँ जुड़ी हैं — कहा जाता है कि जब वे समाधि में निर्वस्त्र भ्रमण कर रहे थे, तब एक सैनिक द्वारा काटे गए उनके हाथ राजा की क्षमा-याचना पर पुनः जुड़ गए। भक्त मानते हैं कि 'भो शम्भो' जैसे उनके शिव-गीतों को गाने से उस संत के मुक्त आनन्द का कुछ अंश प्राप्त होता है, जो मन को शान्त कर आत्मा की ओर मोड़ता है।
सम्पूर्ण पाठ अर्थ सहित
किसी भी पंक्ति या ▶ बटन पर टैप कर सुनें
भो शम्भो शिव शम्भो स्वयम्भो॥
Bho Shambho Shiva Shambho Svayambho
अर्थ:हे शम्भो, मंगलमय शिव, स्वयम्भू!
गङ्गाधर शङ्कर करुणाकर मामव भवसागरतारक॥ भो शम्भो शिव शम्भो स्वयम्भो॥
Gangadhara Shankara Karunakara Mam-Ava Bhava-Sagara-Taraka Bho Shambho Shiva Shambho Svayambho
अर्थ:हे गंगाधर, हे शंकर, हे करुणा के आगार — मेरी रक्षा कीजिए, हे संसार-सागर से पार उतारने वाले! भो शम्भो, शिव शम्भो, स्वयम्भो!
निर्गुण परब्रह्मस्वरूप गगनाकार अखण्ड अमेय॥ भो शम्भो शिव शम्भो स्वयम्भो॥
Nirguna Para-Brahma-Svarupa Gagana-Akara Akhanda Ameya Bho Shambho Shiva Shambho Svayambho
अर्थ:हे निर्गुण परब्रह्मस्वरूप, आकाश के समान निराकार और सर्वव्यापी, अखण्ड और अमेय! भो शम्भो, शिव शम्भो, स्वयम्भो!
नित्य निरामय निष्कलरूप निजगुहनिहित नितान्त अनन्त॥ भो शम्भो शिव शम्भो स्वयम्भो॥
Nitya Niramaya Nishkala-Rupa Nija-Guha-Nihita Nitanta Ananta Bho Shambho Shiva Shambho Svayambho
अर्थ:हे नित्य, निरामय, निष्कलरूप, अपने ही हृदय-गुहा में निहित, नितान्त अनन्त! भो शम्भो, शिव शम्भो, स्वयम्भो!
कैवल्यपते परमशिवेश्वर परमानन्दतनो प्रणतार्तिहर॥ भो शम्भो शिव शम्भो स्वयम्भो॥
Kaivalya-Pate Parama-Shiv-Eshvara Parama-Ananda-Tano Pranata-Arti-Hara Bho Shambho Shiva Shambho Svayambho
अर्थ:हे कैवल्य के स्वामी, परमशिवेश्वर, हे परमानन्दस्वरूप, प्रणाम करने वालों की पीड़ा हरने वाले! भो शम्भो, शिव शम्भो, स्वयम्भो!
शब्द-दर-शब्द अर्थ
उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें
भो शम्भो शिव शम्भो स्वयम्भो पाठ के लाभ
प्रेममयी भक्ति को शिव के निर्गुण ब्रह्म रूप की सर्वोच्च अद्वैत दृष्टि के साथ जोड़ता है।
इसकी सरल, पुनरावर्ती टेक 'भो शम्भो' इसे कीर्तन रूप में गाने में सहज और आनन्ददायक बनाती है।
शरणागति को जगाता है — 'मेरी रक्षा कीजिए और संसार-सागर से पार उतारिए'।
मन को 'हृदय-गुहा में निहित' आत्मा की ओर अन्तर्मुख करता है।
एक प्रिय कर्नाटक संगीत रचना, जिसे सुनना और गाना शान्तिदायक एवं ध्यानमय है।
मुक्ति हेतु शिव को कैवल्यपति, मोक्ष के स्वामी के रूप में आह्वान करता है।
भो शम्भो शिव शम्भो स्वयम्भो जप विधि
प्रत्येक पद के बीच 'भो शम्भो शिव शम्भो स्वयम्भो' टेक को गाएँ या जपें, इसे एक स्थिर, आनन्दमय पुनरावृत्ति बनने दें। स्तोत्र के दो भावों पर चिन्तन करें: पहले उस करुणामय प्रभु के प्रति प्रेमपूर्ण पुकार जो हमें बचाते हैं, फिर शिव का हृदय के भीतर स्थित निराकार, आनन्दमय आत्मा के रूप में चिन्तन। इसे कीर्तन रूप में मधुरता से गाया जा सकता है या ध्यान रूप में मन्द स्वर में जपा जा सकता है। कोई निश्चित संख्या नहीं — जब तक हृदय चाहे, भक्ति के साथ दोहराएँ।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
ये भी पढ़ें
ॐ
Explore more sacred mantras with complete meaning and chanting guides