गर्ज गर्ज क्षणं मूढ (देवी की ललकार और महिषासुर-वध)
अन्य नाम / खोज: garja garja kshanam mudha · garja garja madhu yavat pibamyaham · mahishasura vadha verse · devi challenge to mahishasura · durga saptashati chapter 3
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✦ अर्थ
यह दुर्गा सप्तशती के तृतीय अध्याय का चरम क्षण है — महिषासुर का वध। देवी अपनी ललकार देती हैं और रूप बदलने वाले असुर से कहती हैं कि जब तक वह गरज सकता है गरज ले, क्योंकि उसकी मृत्यु निकट है। फिर वे उस पर उछल पड़ती हैं, चरण से उसका कण्ठ दबाती हैं, त्रिशूल से प्रहार करती हैं, और जब वह आधा ही भैंसे के रूप से बाहर निकला होता है, तब महाखड्ग से उसका सिर काट देती हैं। इसी पराक्रम से वे सदा 'महिषासुरमर्दिनी' के रूप में पूजित हैं।
उत्पत्ति और कथा
Durga Saptashati Chapter 3 · Sage Markandeya (Markandeya Purana) · c. 400–600 CE (Markandeya Purana)
देवी द्वारा महिषासुर की विशाल सेनाओं और उसके सेनापतियों का संहार करने के पश्चात्, स्वयं महिषासुर भैंसे, सिंह, मनुष्य और हाथी के बीच बार-बार रूप बदलते हुए देवी पर टूट पड़ा। युद्ध में मत्त देवी ने दिव्य मधु पान किया, अपनी निर्भय ललकार दी, और अन्ततः उसे चरण से दबाकर तथा जब वह अपने भैंसे रूप से निकलने का प्रयत्न कर रहा था तभी उसका सिर काटकर असुरों के सौ वर्ष के अत्याचार का अन्त किया।
✦ शास्त्रों में वर्णित
भक्त बताते हैं कि इस दृश्य का स्मरण — रूप बदलने वाले असुर को देवी द्वारा चरण से कुचलना — ने दुर्बल और भयभीत जनों को उत्पीड़कों और अत्याचारियों के विरुद्ध दृढ़ता से खड़े होने का साहस दिया है, मानो उनकी आवश्यकता की घड़ी में दुर्गा का अपना विजयी पराक्रम उधार मिल गया हो।
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देव्युवाच गर्ज गर्ज क्षणं मूढ मधु यावत्पिबाम्यहम् । मया त्वयि हतेऽत्रैव गर्जिष्यन्त्याशु देवताः ॥
devyuvāca garja garja kṣaṇaṃ mūḍha madhu yāvatpibāmyaham mayā tvayi hate'traiva garjiṣyantyāśu devatāḥ
अर्थ:देवी बोलीं — 'अरे मूढ़! क्षण भर गरज ले, गरज ले, जब तक मैं यह मधु पी रही हूँ। जब मैं तुझे यहीं मार डालूँगी, तब शीघ्र ही देवता गरजेंगे।' ऋषि बोले — ऐसा कहकर देवी ने उछलकर उस महान् असुर पर चढ़कर, अपने चरण से उसका कण्ठ दबाकर उसे त्रिशूल से मारा। तब देवी के चरण से दबा हुआ वह अपने (भैंसे के) मुख से आधा ही बाहर निकल पाया था कि देवी के पराक्रम से पूरी तरह घिर गया। इस प्रकार आधा ही निकला हुआ, युद्ध करता वह महान् असुर देवी द्वारा महाखड्ग से सिर काटकर गिरा दिया गया।
ऋषिरुवाच एवमुक्त्वा समुत्पत्य सारूढा तं महासुरम् । पादेनाक्रम्य कण्ठे च शूलेनैनमताडयत् ॥
ṛṣiruvāca evamuktvā samutpatya sārūḍhā taṃ mahāsuram pādenākramya kaṇṭhe ca śūlenainamatāḍayat
ततः सोऽपि पदाक्रान्तस्तया निजमुखात्तदा । अर्धनिष्क्रान्त एवासीद्देव्या वीर्येण संवृतः ॥
tataḥ so'pi padākrāntastayā nijamukhāttadā ardhaniṣkrānta evāsīddevyā vīryeṇa saṃvṛtaḥ
अर्धनिष्क्रान्त एवासौ युध्यमानो महासुरः । तया महासिना देव्या शिरश्छित्त्वा निपातितः ॥
ardhaniṣkrānta evāsau yudhyamāno mahāsuraḥ tayā mahāsinā devyā śiraśchittvā nipātitaḥ
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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गर्ज गर्ज क्षणं मूढ (देवी की ललकार और महिषासुर-वध) पाठ के लाभ
देवी का महिषासुरमर्दिनी, बुराई की निर्भय संहारिणी रूप में आवाहन करता है
अपने भीतरी और बाहरी राक्षसों का सामना करने और उन पर विजय पाने का साहस एवं संकल्प जगाता है
देवी की ललकारती वाणी अधर्म पर निश्चित विजय का विश्वास जगाती है
रूप बदलने वाले और निरन्तर बने रहने वाले शत्रुओं तथा विघ्नों से रक्षा हेतु जपा जाता है
नवरात्रि में, विशेषतः महा अष्टमी और नवमी को शक्तिशाली
भक्त को स्मरण कराता है कि दिव्यता सदा अहंकार और अत्याचार पर विजय पाती है
गर्ज गर्ज क्षणं मूढ (देवी की ललकार और महिषासुर-वध) जप विधि
सप्तशती के बीज मंत्र 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे' का प्रथम उच्चारण करके, उत्साह और भक्ति सहित जप करें, देवी को विजय के क्षण में असुर पर सवार रूप में देखते हुए। ये श्लोक निरन्तर कठिनाइयों का सामना करते समय दुर्गा की विजयिनी ऊर्जा को आकर्षित करने के लिए जपे जाते हैं। इन्हें महिषासुरमर्दिनी कथा के अंग के रूप में अथवा दुर्गा सप्तशती के तृतीय अध्याय के पाठ के समय जपना श्रेष्ठ है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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