हस्तामलकीयम् (हस्तामलकस्तोत्रम्)
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✦ अर्थ
हस्तामलकीयम् (हस्तामलकस्तोत्रम्) बारह मुख्य श्लोकों का प्रसिद्ध अद्वैत स्तोत्र है, जिसे बालक-ऋषि हस्तामलक ने आदि शंकराचार्य के प्रश्न 'तुम कौन हो?' के उत्तर में कहा था। बालक उत्तर देता है कि वह कोई शारीरिक या सामाजिक पहचान नहीं, अपितु नित्य साक्षी-चैतन्य है — 'स नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा', 'वह आत्मा, जिसका स्वरूप ही नित्य बोध है, मैं हूँ' — यही प्रत्येक श्लोक का ध्रुवपद है। सूर्य, दर्पण और जल में प्रतिबिम्बित चन्द्रकिरणों के दृष्टान्तों से यह आत्मा को मन-इन्द्रियों के पीछे स्थित स्वप्रकाश तत्त्व के रूप में बताता है। शंकराचार्य इससे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने इस पर भाष्य लिखा।
उत्पत्ति और कथा
Advaita stotra recorded by tradition; verses spoken by Hastamalakacharya, commentary by Adi Shankaracharya · Hastamalakacharya (verses); Adi Shankaracharya (compiler and commentator) · Classical (traditionally 8th century CE)
परम्परा के अनुसार, जब आदि शंकराचार्य यात्रा कर रहे थे, उनकी भेंट एक बालक से हुई, जो यद्यपि दूसरों को मन्द एवं मौन प्रतीत होता था, वस्तुतः आत्मा में निमग्न एक महान् आत्मा था। जब शंकराचार्य ने उससे पूछा 'हे बालक, तुम कौन हो? कहाँ से आते हो?', तब बालक ने इन बारह प्रकाशमय श्लोकों से उत्तर दिया, जिनमें आत्मा को देह, जाति, आश्रम एवं इन्द्रियों से अछूते नित्य साक्षी-चैतन्य के रूप में घोषित किया। शंकराचार्य ने उसकी अनुभूति को 'हथेली पर रखे फल के समान स्पष्ट' पहचानकर उसे हस्तामलक नाम दिया तथा अपने चार प्रमुख शिष्यों में से एक बनाया। ये श्लोक इतने गहन थे कि शंकराचार्य ने इन पर भाष्य लिखा।
✦ शास्त्रों में वर्णित
परम्परा बताती है कि बालक हस्तामलक को उसके अपने परिवार ने मन्दबुद्धि एवं मूक समझा था, क्योंकि वह सदा अन्तर में निमग्न रहता था; किन्तु शंकराचार्य के एक ही प्रश्न पर वेदान्त का समस्त ज्ञान इन बारह निर्दोष श्लोकों के रूप में उससे प्रवाहित हो उठा, जिससे प्रकट हुआ कि जिसे संसार मूर्ख समझता था, वह वस्तुतः एक ऐसा ऋषि था जिसका आत्मज्ञान उसके लिए हथेली पर रखे आँवले के समान स्पष्ट था।
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कस्त्वं शिशो कस्य कुतोऽसि गन्ता किं नाम ते त्वं कुत आगतोऽसि। एतन्मयोक्तं वद चार्भक त्वं मत्प्रीतये प्रीतिविवर्धनोऽसि॥१॥
kastvaṃ śiśo kasya kuto'si gantā kiṃ nāma te tvaṃ kuta āgato'si | etan mayoktaṃ vada cārbhaka tvaṃ mat-prītaye prīti-vivardhano'si ||1||
अर्थ:(शंकराचार्य पूछते हैं:) हे बालक! तुम कौन हो? किसके हो? कहाँ जा रहे हो? तुम्हारा नाम क्या है और तुम कहाँ से आए हो? हे प्यारे बालक, यह सब मुझे बताओ — तुम मुझे प्रिय हो, मेरी प्रीति बढ़ाते हो।
नाहं मनुष्यो न च देवयक्षौ न ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्राः। न ब्रह्मचारी न गृही वनस्थो भिक्षुर्न चाहं निजबोधरूपः॥२॥
nāhaṃ manuṣyo na ca deva-yakṣau na brāhmaṇa-kṣatriya-vaiśya-śūdrāḥ | na brahmacārī na gṛhī vanastho bhikṣur na cāhaṃ nija-bodha-rūpaḥ ||2||
अर्थ:(बालक उत्तर देता है:) मैं न मनुष्य हूँ, न देव या यक्ष; न ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र; न ब्रह्मचारी, न गृहस्थ, न वानप्रस्थ, न संन्यासी — मैं तो स्वयं अपने बोधस्वरूप (निजबोधरूप) आत्मा हूँ।
निमित्तं मनश्चक्षुरादिप्रवृत्तौ निरस्ताखिलोपाधिराकाशकल्पः। रविर्लोकचेष्टानिमित्तं यथा यः स नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा॥३॥
nimittaṃ manaś-cakṣur-ādi-pravṛttau nirastākhilopādhir ākāśa-kalpaḥ | ravir loka-ceṣṭā-nimittaṃ yathā yaḥ sa nityopalabdhi-svarūpo'ham ātmā ||3||
अर्थ:जो मन, चक्षु आदि की प्रवृत्ति का निमित्त है, फिर भी समस्त उपाधियों से रहित और आकाश के समान सूक्ष्म है — जैसे सूर्य संसार की समस्त चेष्टाओं का (निरपेक्ष) निमित्त है — वह नित्य-उपलब्धिस्वरूप आत्मा मैं हूँ।
यमग्न्युष्णवन्नित्यबोधस्वरूपं मनश्चक्षुरादीन्यबोधात्मकानि। प्रवर्तन्त आश्रित्य निष्कम्पमेकं स नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा॥४॥
yam agny-uṣṇavan nitya-bodha-svarūpaṃ manaś-cakṣur-ādīny abodhātmakāni | pravartanta āśritya niṣkampam ekaṃ sa nityopalabdhi-svarūpo'ham ātmā ||4||
अर्थ:जैसे उष्णता अग्नि से अभिन्न है, वैसे ही जो नित्यबोधस्वरूप है, और जिस एक निष्कम्प तत्त्व का आश्रय लेकर अबोधात्मक (जड़) मन-चक्षु आदि प्रवृत्त होते हैं — वह नित्य-उपलब्धिस्वरूप आत्मा मैं हूँ।
मुखाभासको दर्पणे दृश्यमानो मुखत्वात्पृथक्त्वेन नैवास्ति वस्तु। चिदाभासको धीषु जीवोऽपि तद्वत् स नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा॥५॥
mukhābhāsako darpaṇe dṛśyamāno mukhatvāt pṛthaktvena naivāsti vastu | cid-ābhāsako dhīṣu jīvo'pi tadvat sa nityopalabdhi-svarūpo'ham ātmā ||5||
अर्थ:दर्पण में दिखता मुख का प्रतिबिम्ब मुख से पृथक् कोई वास्तविक वस्तु नहीं है; उसी प्रकार बुद्धियों में चैतन्य का आभास जीव है — वह नित्य-उपलब्धिस्वरूप आत्मा मैं हूँ।
यथा दर्पणाभाव आभासहानौ मुखं विद्यते कल्पनाहीनमेकम्। तथा धीवियोगे निराभासको यः स नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा॥६॥
yathā darpaṇābhāva ābhāsa-hānau mukhaṃ vidyate kalpanā-hīnam ekam | tathā dhī-viyoge nirābhāsako yaḥ sa nityopalabdhi-svarūpo'ham ātmā ||6||
अर्थ:जैसे दर्पण के अभाव में प्रतिबिम्ब के लुप्त होने पर भी एक मुख कल्पनारहित रूप में विद्यमान रहता है, वैसे ही बुद्धि के वियोग में जो निराभास शेष रहता है — वह नित्य-उपलब्धिस्वरूप आत्मा मैं हूँ।
मनश्चक्षुरादेर्वियुक्तः स्वयं यो मनश्चक्षुरादेर्मनश्चक्षुरादिः। मनश्चक्षुरादेरगम्यस्वरूपः स नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा॥७॥
manaś-cakṣur-āder viyuktaḥ svayaṃ yo manaś-cakṣur-āder manaś-cakṣur-ādiḥ | manaś-cakṣur-āder agamya-svarūpaḥ sa nityopalabdhi-svarūpo'ham ātmā ||7||
अर्थ:जो स्वयं मन-चक्षु आदि से वियुक्त है, फिर भी मन का मन और चक्षु का चक्षु है, जिसका स्वरूप मन-इन्द्रियों के लिए अगम्य है — वह नित्य-उपलब्धिस्वरूप आत्मा मैं हूँ।
य एको विभाति स्वतः शुद्धचेताः प्रकाशस्वरूपोऽपि नानेव धीषु। शरावोदकस्थो यथा भानुरेकः स नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा॥८॥
ya eko vibhāti svataḥ śuddha-cetāḥ prakāśa-svarūpo'pi nāneva dhīṣu | śarāvodaka-stho yathā bhānur ekaḥ sa nityopalabdhi-svarūpo'ham ātmā ||8||
अर्थ:जो एक शुद्धचेतन स्वतः प्रकाशित होता है, प्रकाशस्वरूप होते हुए भी बुद्धियों में अनेक-सा भासता है — जैसे जल से भरे अनेक पात्रों में एक ही सूर्य — वह नित्य-उपलब्धिस्वरूप आत्मा मैं हूँ।
यथानेकचक्षुःप्रकाशो रविर्न क्रमेण प्रकाशीकरोति प्रकाश्यम्। अनेका धियो यस्तथैकः प्रबोधः स नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा॥९॥
yathāneka-cakṣuḥ-prakāśo ravir na krameṇa prakāśī-karoti prakāśyam | anekā dhiyo yas tathaikaḥ prabodhaḥ sa nityopalabdhi-svarūpo'ham ātmā ||9||
अर्थ:जैसे अनेक नेत्रों का प्रकाशक सूर्य प्रकाश्य पदार्थों को क्रमशः नहीं, अपितु एक साथ प्रकाशित करता है, वैसे ही जो एक प्रबोध अनेक बुद्धियों को प्रकाशित करता है — वह नित्य-उपलब्धिस्वरूप आत्मा मैं हूँ।
विवस्वत्प्रभातं यथा रूपमक्षं प्रगृह्णाति नाभातमेवं विवस्वान्। यदाभात आभासयत्यक्षमेकः स नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा॥१०॥
vivasvat-prabhātaṃ yathā rūpam akṣaṃ pragṛhṇāti nābhātam evaṃ vivasvān | yad-ābhāta ābhāsayaty akṣam ekaḥ sa nityopalabdhi-svarūpo'ham ātmā ||10||
अर्थ:जैसे नेत्र सूर्य से प्रकाशित रूप को ग्रहण करता है पर स्वयं अप्रकाशित सूर्य को नहीं, वैसे ही जिसके भासने से नेत्र (आदि) प्रकाशित होकर कार्य करते हैं — वह नित्य-उपलब्धिस्वरूप आत्मा मैं हूँ।
यथा सूर्य एकोऽप्स्वनेकश्चलासु स्थिरास्वप्यनन्यद्विभाव्यस्वरूपः। चलासु प्रभिन्नः सुधीष्वेक एव स नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा॥११॥
yathā sūrya eko'psv aneka-ścalāsu sthirāsv apy ananyad vibhāvya-svarūpaḥ | calāsu prabhinnaḥ sudhīṣv eka eva sa nityopalabdhi-svarūpo'ham ātmā ||11||
अर्थ:जैसे एक ही सूर्य चंचल जलों में अनेक और स्थिर जल में अनन्य (एक) भासता है, अपने स्वरूप में सदा एक रहता है — चंचल बुद्धियों में भिन्न-सा, किन्तु विवेकी जनों में एक ही — वह नित्य-उपलब्धिस्वरूप आत्मा मैं हूँ।
घनच्छन्नदृष्टिर्घनच्छन्नमर्कं यथा निष्प्रभं मन्यते चातिमूढः। तथा बद्धवद्भाति यो मूढदृष्टेः स नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा॥१२॥
ghana-cchanna-dṛṣṭir ghana-cchannam arkaṃ yathā niṣprabhaṃ manyate cātimūḍhaḥ | tathā baddhavad bhāti yo mūḍha-dṛṣṭeḥ sa nityopalabdhi-svarūpo'ham ātmā ||12||
अर्थ:जैसे बादलों से ढकी दृष्टि वाला अत्यन्त मूढ़ व्यक्ति बादल से ढके सूर्य को निष्प्रभ मान लेता है, वैसे ही मूढ़ दृष्टि को जो (नित्यमुक्त आत्मा) बद्ध-सा भासता है — वह नित्य-उपलब्धिस्वरूप आत्मा मैं हूँ।
समस्तेषु वस्तुष्वनुस्यूतमेकं समस्तानि वस्तूनि यन्न स्पृशन्ति। वियद्वत्सदा शुद्धमच्छस्वरूपं स नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा॥१३॥
samasteṣu vastuṣv anusyūtam ekaṃ samastāni vastūni yan na spṛśanti | viyadvat sadā śuddham accha-svarūpaṃ sa nityopalabdhi-svarūpo'ham ātmā ||13||
अर्थ:जो समस्त वस्तुओं में अनुस्यूत एक है, जिसे समस्त वस्तुएँ स्पर्श नहीं करतीं, जो आकाश के समान सदा शुद्ध और निर्मलस्वरूप है — वह नित्य-उपलब्धिस्वरूप आत्मा मैं हूँ।
उपाधौ यथा भेदता सन्मणीनां तथा भेदता बुद्धिभेदेषु तेऽपि। यथा चन्द्रिकाणां जले चञ्चलत्वं तथा चञ्चलत्वं तवापीह विष्णो॥१४॥
upādhau yathā bhedatā san-maṇīnāṃ tathā bhedatā buddhi-bhedeṣu te'pi | yathā candrikāṇāṃ jale cañcalatvaṃ tathā cañcalatvaṃ tavāpīha viṣṇo ||14||
अर्थ:जैसे सच्चे मणियों में भेद उनकी उपाधि (आधार) के कारण ही प्रतीत होता है, वैसे ही (आप में) भेद बुद्धियों के भेद के कारण ही है; और जैसे जल में चन्द्रकिरणों की चंचलता जल के कारण है, वैसे ही हे विष्णो, यह चंचलता आप में भी (केवल आभासमात्र) है।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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हस्तामलकीयम् (हस्तामलकस्तोत्रम्) पाठ के लाभ
सूर्य, दर्पण, प्रतिबिम्बित चन्द्र जैसे सजीव, सुग्राह्य दृष्टान्तों द्वारा अद्वैत वेदान्त का सार प्रस्तुत करता है
'मैं नित्य साक्षी-चैतन्य हूँ, देह या मन नहीं' — इस अनुभूति को दृढ़ करता है
आत्म-विचार (आत्मविचार) तथा सच्चे 'मैं' पर ध्यान के लिए उत्तम पाठ
आत्मा के नित्यमुक्त, निर्मल स्वरूप को प्रकट कर मन को शान्त करता है
अद्वैत परम्परा में एक आत्मसाक्षात्कारी बालक-ऋषि की स्वतःस्फूर्त वाणी रूप में मूल्यवान माना जाता है
समझ की स्पष्टता (विवेक) तथा अद्वैत बोध में स्थिरता के लिए पाठ किया जाता है
हस्तामलकीयम् (हस्तामलकस्तोत्रम्) जप विधि
पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके शान्तिपूर्वक बैठें। शंकराचार्य के प्रारम्भिक प्रश्न से आरम्भ करें, फिर बारह उत्तर-श्लोकों को धीरे-धीरे पढ़ें, 'स नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा' — 'वह नित्य बोध स्वरूप आत्मा मैं हूँ' — इस ध्रुवपद पर ठहरते हुए। प्रत्येक दृष्टान्त (अनेक जलों में प्रतिबिम्बित सूर्य, दर्पण में मुख) को अपने साक्षी-स्वरूप की ओर संकेत के रूप में चिन्तन करें। मनन के लिए प्रतिदिन एक बार एकाग्र पाठ आदर्श है; इसे अर्थ सहित अध्ययन भी किया जा सकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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