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मेरे तो गिरधर गोपाल

🕉️ hindu·📿 1× जप·🕐 भजन और सत्संग के दौरान, संध्या-प्रार्थना में, या किसी भी समय कृष्ण के प्रति प्रेम की अभिव्यक्ति के रूप में·📜 Composed by Meera Bai (16th-century bhakti tradition)

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अर्थ

मेरे तो गिरधर गोपाल सोलहवीं सदी की संत-कवयित्री मीरा बाई द्वारा रचित कृष्ण-भजन है, जो उनके प्रति उनके अनन्य प्रेम की घोषणा करता है। इसमें वे परिवार, कुल-मर्यादा और लोक-लाज को त्यागकर केवल गिरधर गोपाल को अपना सर्वस्व मानती हैं। यह निर्भय भक्ति और वैराग्य जगाता है।

उत्पत्ति और कथा

Composed by Meera Bai (16th-century bhakti tradition) · Meera Bai · 16th century

राजपूत राजकुमारी के रूप में जन्मी मीरा बाई ने कृष्ण के प्रेम के लिए राजसी जीवन और रूढ़ियों को त्याग दिया, जिन्हें वे गिरधर गोपाल कहती थीं। इस पद में वे पारिवारिक बंधनों और लोक-निंदा के भय को त्यागकर संतों की संगति और संन्यासिनी का मोटा वस्त्र चुनती हैं। उनके आँसुओं से सींची गई 'प्रेम की बेल' हिंदी भक्ति-काव्य की सबसे प्रिय छवियों में से एक है।

शास्त्रों में वर्णित

मीरा के गीत इसलिए बचे रहे क्योंकि उन्हें जिया गया था: कथा कहती है कि विष अमृत में बदल गया और अन्य परीक्षाओं से वे अपने प्रेम के बल पर अक्षत निकलीं। भक्त कहते हैं कि 'मेरे तो गिरधर गोपाल' गाने से वही निर्भय एकनिष्ठता जागती है — उसकी स्वतंत्रता जिसने ईश्वर को अपना सर्वस्व बना लिया है।

सम्पूर्ण पाठ अर्थ सहित

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श्लोक 1

मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो कोई। जाके सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई॥

Mere to Giridhar Gopal, doosro na koi Jaake sir mor mukut, mero pati soi

अर्थ:मेरे तो बस गिरधर गोपाल हैं, दूसरा कोई नहीं। जिनके सिर पर मोर मुकुट है, वही मेरे पति हैं।

श्लोक 2

तात मात भ्रात बंधु, आपनो कोई। छाँड़ि दई कुल की कानि, कहा करिहै कोई॥

Taat maat bhraat bandhu, aapno na koi Chhaandi dayi kul ki kaani, kaha karihai koi

अर्थ:पिता, माता, भाई, बंधु — कोई अपना नहीं। मैंने कुल की मर्यादा का मोह छोड़ दिया; अब कोई क्या कर लेगा।

श्लोक 3

संतन ढिग बैठि बैठि, लोक लाज खोई। चुनरी के किए टूक, ओढ़ लीन्ही लोई॥

Santan dhig baithi baithi, lok laaj khoi Chunari ke kiye took, odh leenhi loi

अर्थ:संतों के पास बैठ-बैठकर मैंने लोक-लाज खो दी। चुनरी के टुकड़े कर दिए और मोटी लोई ओढ़ ली।

श्लोक 4

आँसुन जल सींचि सींचि, प्रेम बेलि बोई। अब तो बेलि फैल गई, आणंद फल होई॥

Aansun jal seenchi seenchi, prem beli boi Ab to beli phail gayi, aanand phal hoi

अर्थ:आँसुओं के जल से सींच-सींचकर मैंने प्रेम की बेल बोई; अब वह बेल फैल गई है और आनंद का फल दे रही है।

श्लोक 5

मीरा प्रभु गिरधर नागर, मिल्या मोहि सोई॥

Meera prabhu Girdhar Nagar, milya mohi soi

अर्थ:मीरा के प्रभु गिरधर नागर हैं; वही मुझे मिल गए हैं।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

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मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई🔊Mere to Giridhar Gopal, doosro na koiगिरधर गोपाल (कृष्ण) ही मेरे हैं; दूसरा कोई नहीं
जाके सिर मोर मुकुट🔊Jaake sir mor mukutजो मोर-पंख का मुकुट धारण करते हैं
मेरो पति सोई🔊mero pati soiवही मेरे पति हैं
छाँड़ि दई कुल की कानि🔊chhaandi dayi kul ki kaaniमैंने कुल की मर्यादा का मोह त्याग दिया है
संतन ढिग बैठि बैठि, लोक लाज खोई🔊santan dhig baithi, lok laaj khoiसंतों के बीच बैठकर मैंने सारी लोक-लाज खो दी है
प्रेम बेलि बोई🔊prem beli boiमैंने प्रेम की बेल बोई है
आणंद फल होई🔊aanand phal hoiऔर अब वह आनंद का फल देती है

मेरे तो गिरधर गोपाल पाठ के लाभ

मीरा बाई की कृष्ण के प्रति पूर्ण, एकनिष्ठ प्रेम की घोषणा।

निर्भय भक्ति का गीत जो ईश्वर को परिवार, स्थिति और समाज की राय से ऊपर रखता है।

सत्संग, शास्त्रीय और फ़िल्मी प्रस्तुतियों — सब में समूचे भारत में प्रिय।

वैराग्य और अपनी भक्ति का अनुसरण करने का साहस जगाता है।

सरल ब्रजभाषा की पंक्तियाँ जो गाने में सहज और गहराई से मन को छूने वाली हैं।

मेरे तो गिरधर गोपाल जप विधि

जप संख्या1बार
उत्तम समयभजन और सत्संग के दौरान, संध्या-प्रार्थना में, या किसी भी समय कृष्ण के प्रति प्रेम की अभिव्यक्ति के रूप में

धीरे-धीरे और हृदय से गाएँ, मीरा के पूर्ण समर्पण को अनुभव करते हुए। कोई कर्मकांड नहीं है — पंक्तियों को उस भक्त की तड़प से भरने दें जिसके लिए केवल ईश्वर ही महत्त्व रखते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मीरा बाई ने, जो सोलहवीं सदी की राजपूत संत-कवयित्री और कृष्ण की भक्त थीं। यह उनके सबसे प्रसिद्ध पदों में से एक है, जो भगवान के प्रति उनके अविभाजित प्रेम को व्यक्त करता है।
'गिरधर' का अर्थ है 'पर्वत को उठाने वाला' — कृष्ण, जिन्होंने गोवर्धन पर्वत को उठाया; 'गोपाल' गोपों के स्वामी हैं। मीरा इन्हीं कृष्ण को अपना एकमात्र पति और आश्रय घोषित करती हैं।
मीरा द्वारा कृष्ण के प्रेम के लिए परिवार, स्थिति और लोक-लाज का त्याग — और वह आनंद जो उनकी भक्ति, आँसुओं से सींची जाकर, अंततः फल के रूप में लाई।

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