श्री कृष्णाष्टकम् (भजे व्रजैकमण्डनम्)
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✦ अर्थ
'भजे व्रजैक मण्डनम्' से आरंभ होने वाला कृष्णाष्टकम् भगवान कृष्ण की स्तुति में एक मधुर अष्टपदी स्तोत्र है, जो परंपरागत रूप से आदि शंकराचार्य को आरोपित है। प्रवाहमयी अंत्यानुप्रासयुक्त छंद में रचित, प्रत्येक श्लोक 'नमामि…' (मैं प्रणाम करता हूँ) से समाप्त होता है, कृष्ण को व्रज के आभूषण, गोवर्धन उठाने वाले कमलनयन, गोपियों के प्रियतम और हृदय-चोर के रूप में पूजते हुए। समापन श्लोक इसका पाठ करने वालों को हर जन्म में कृष्ण के प्रति शुद्ध भक्ति का वचन देता है।
उत्पत्ति और कथा
Attributed to Adi Shankaracharya (Stotra literature) · Adi Shankaracharya · c. 8th century CE
भगवान कृष्ण, विष्णु के आठवें अवतार, ने अपना बचपन व्रज (वृंदावन) में बिताया, अपनी सुंदरता, अपनी बाँसुरी और अपनी चंचल लीलाओं से सबको मोहित करते हुए — गोवर्धन पर्वत उठाते हुए, इंद्र के अभिमान का मर्दन करते हुए, और गोपों-गोपियों के हृदय चुराते हुए। यह कृष्णाष्टकम्, परंपरागत रूप से आदि शंकराचार्य को आरोपित, उन्हीं लीलाओं को आठ प्रवाहमयी श्लोकों में संजोता है। यह आचार्य को आरोपित कृष्ण के दो प्रसिद्ध अष्टकों में से एक है, दूसरा 'वासुदेव-सुतं देवम्' से आरंभ होता है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
समापन श्लोक स्वयं ही प्रतिज्ञात फल (फल) है: परंपरा मानती है कि जो कोई इन आठ श्लोकों का सच्चे मन से अध्ययन एवं पाठ करता है, उसे जन्म-जन्म कृष्ण के प्रति अटूट भक्ति प्रदान की जाती है — भक्तों को किसी भी सांसारिक लाभ से अधिक प्रिय वरदान।
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भजे व्रजैकमण्डनं समस्तपापखण्डनं स्वभक्तचित्तरञ्जनं सदैव नन्दनन्दनम् । सुपिच्छगुच्छमस्तकं सुनादवेणुहस्तकं अनङ्गरङ्गसागरं नमामि कृष्णनागरम् ॥ १ ॥
Bhaje vrajaikamandanam samastapapakhandanam Svabhaktachittaranjanam sadaiva nandanandanam | Supicchagucchamastakam sunadavenuhastakam Anangarangasagaram namami krishnanagaram || 1 ||
अर्थ:व्रज के एकमात्र आभूषण, समस्त पापों के नाशक, अपने भक्तों के चित्त को आनन्दित करने वाले, सदा आनन्दमय नन्दनन्दन का मैं भजन करता हूँ; जिनके मस्तक पर सुन्दर मयूरपिच्छ का गुच्छ है और हाथ में मधुर ध्वनि वाली वेणु है — जो प्रेम-रस के सागर हैं — उन नागर (रसिक) कृष्ण को मैं नमस्कार करता हूँ।
मनोजगर्वमोचनं विशाललोललोचनं विधूतगोपशोचनं नमामि पद्मलोचनम् । करारविन्दभूधरं स्मितावलोकसुन्दरं महेन्द्रमानदारणं नमामि कृष्णवारणम् ॥ २ ॥
Manojagarvamochanam vishalalolalochanam Vidhutagopashochanam namami padmalochanam | Kararavindabhudharam smitavalokasundaram Mahendramanadaranam namami krishnavaranam || 2 ||
अर्थ:जो कामदेव के गर्व को चूर करते हैं, जिनके नेत्र विशाल एवं चंचल हैं, जो गोपों के शोक को दूर करते हैं — उन कमलनयन को मैं नमस्कार करता हूँ; जिन्होंने अपने करकमल पर पर्वत (गोवर्धन) धारण किया, जो मुस्कानभरी दृष्टि से सुन्दर हैं, जिन्होंने महेन्द्र (इन्द्र) के अभिमान का दमन किया — उन रक्षक कृष्ण को मैं नमस्कार करता हूँ।
कदम्बसूनकुण्डलं सुचारुगण्डमण्डलं व्रजाङ्गनैकवल्लभं नमामि कृष्णदुर्लभम् । यशोदया समोदया सगोपया सनन्दया युतं सुखैकदायकं नमामि गोपनायकम् ॥ ३ ॥
Kadambasunakundalam sucharugandamandalam Vrajanganaikavallabham namami krishnadurlabham | Yashodaya samodaya sagopaya sanandaya Yutam sukhaikadayakam namami gopanayakam || 3 ||
अर्थ:कदम्ब के फूलों के कुण्डल वाले, अति सुन्दर कपोलमण्डल वाले, व्रजांगनाओं के एकमात्र प्रिय — उन दुर्लभ कृष्ण को मैं नमस्कार करता हूँ; यशोदा, गोपों एवं नन्द के साथ आनन्दमग्न, एकमात्र सुखदाता — उन गोपनायक को मैं नमस्कार करता हूँ।
सदैव पादपङ्कजं मदीयमानसे निजं दधानमुक्तमालकं नमामि नन्दबालकम् । समस्तदोषशोषणं समस्तलोकपोषणं समस्तगोपमानसं नमामि नन्दलालसम् ॥ ४ ॥
Sadaiva padapankajam madiyamanase nijam Dadhanamuktamalakam namami nandabalakam | Samastadoshashoshanam samastalokaposhanam Samastagopamanasam namami nandalalasam || 4 ||
अर्थ:जिनके चरणकमल सदा मेरे मन में अपने रूप में निवास करें — खुली अलकावली धारण करने वाले उन नन्दबालक को मैं नमस्कार करता हूँ; समस्त दोषों को सुखाने वाले, समस्त लोकों का पोषण करने वाले, समस्त गोपों के मन में बसने वाले — उन नन्दलाल को मैं नमस्कार करता हूँ।
भुवो भरावतारकं भवाब्धिकर्णधारकं यशोमतीकिशोरकं नमामि चित्तचोरकम् । दृगन्तकान्तभङ्गिनं सदा सदालसङ्गिनं दिने दिने नवं नवं नमामि नन्दसम्भवम् ॥ ५ ॥
Bhuvo bharavatarakam bhavabdhikarnadharakam Yashomatikishorakam namami chittachorakam | Drigantakantabhanginam sada sadalasanginam Dine dine navam navam namami nandasambhavam || 5 ||
अर्थ:पृथ्वी के भार को उतारने के लिए अवतरित, भवसागर के कर्णधार, यशोदा के किशोर — उन चित्तचोर को मैं नमस्कार करता हूँ; नेत्रों के मनोहर कटाक्षों वाले, सदा सत्संगी, प्रतिदिन नवीन-से-नवीन — उन नन्दनन्दन को मैं नमस्कार करता हूँ।
गुणाकरं सुखाकरं कृपाकरं कृपापरं सुरद्विषन्निकन्दनं नमामि गोपनन्दनम् । नवीनगोपनागरं नवीनकेलिलम्पटं नमामि मेघसुन्दरं तडित्प्रभालसत्पटम् ॥ ६ ॥
Gunakaram sukhakaram kripakaram kripaparam Suradvishannikandanam namami gopanandanam | Navinagopanagaram navinakelilampatam Namami meghasundaram taditprabhalasatpatam || 6 ||
अर्थ:गुणों के आकर, सुख के आकर, कृपा के आकर, परम कृपालु, देवशत्रुओं के नाशक — उन गोपनन्दन को मैं नमस्कार करता हूँ; नित्य नवीन गोप-नागर, नवीन क्रीडा में रत, मेघ के समान सुन्दर, बिजली-सी चमकती पीताम्बरधारी — उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ।
समस्तगोपनन्दनं हृदम्बुजैकमोदनं नमामि कुञ्जमध्यगं प्रसन्नभानुशोभनम् । निकामकामदायकं दृगन्तचारुसायकं रसालवेणुगायकं नमामि कुञ्जनायकम् ॥ ७ ॥
Samastagopanandanam hridambujaikamodanam Namami kunjamadhyagam prasannabhanushobhanam | Nikamakamadayakam drigantacharusayakam Rasalavenugayakam namami kunjanayakam || 7 ||
अर्थ:समस्त गोपों के आनन्द, हृदयकमल के एकमात्र हर्ष — कुंज के मध्य विराजमान, प्रसन्न सूर्य-सी शोभा वाले उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ; समस्त कामनाओं के दाता, कटाक्ष के सुन्दर बाण वाले, मधुर वेणु-गायक — उन कुंजनायक को मैं नमस्कार करता हूँ।
विदग्धगोपिकामनोमनोज्ञतल्पशायिनं नमामि कुञ्जकाननं प्रविष्टरासमण्डनम् । यदा तदा यथा तथा तथैव कृष्णसत्कथा मया सदैव गीयतां तथा कृपा विधीयताम् ॥ ८ ॥
Vidagdhagopikamanomanojnatalpashayinam Namami kunjakananam pravishtarasamandanam | Yada tada yatha tatha tathaiva krishnasatkatha Maya sadaiva giyatam tatha kripa vidhiyatam || 8 ||
अर्थ:चतुर गोपियों के मनोहर शय्या पर शयन करने वाले — रासमण्डल में प्रविष्ट कुंजवन के आभूषण को मैं नमस्कार करता हूँ; जब-तब, जैसे-वैसे, सदा मैं कृष्ण की सत्कथा गाता रहूँ — हे प्रभो, मुझ पर ऐसी ही कृपा कीजिए।
प्रमाणिकाष्टकद्वयं जपत्यधीत्य यः पुमान् भवेत्स नन्दनन्दने भवे भवे सुभक्तिमान् ॥
Pramanikashtakadvayam japatyadhitya yah puman Bhavetsa nandanandane bhave bhave subhaktiman ||
अर्थ:जो मनुष्य इस प्रामाणिक अष्टक-युगल का अध्ययन कर जप करता है, वह जन्म-जन्मान्तर में नन्दनन्दन के प्रति उत्तम भक्ति से युक्त हो जाता है।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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श्री कृष्णाष्टकम् (भजे व्रजैकमण्डनम्) पाठ के लाभ
व्रज के मोहन के रूप में भगवान कृष्ण के प्रति प्रेममयी भक्ति (माधुर्य भक्ति) जगाता है।
कृष्ण के स्वरूप, लीलाओं और कृपा का सुंदर वर्णन करता है, जो ध्यान और गायन के लिए आदर्श है।
समापन श्लोक इसका पाठ करने वालों को जन्म-जन्म में कृष्ण के प्रति अटल भक्ति का वचन देता है।
माना जाता है कि यह समस्त पापों का नाश करता है, जैसा कि प्रथम श्लोक ('समस्त-पाप-खण्डनम्') में घोषित है।
अपने प्रवाहमयी, संगीतमय छंद के द्वारा हृदय में शांति, आनंद और माधुर्य लाता है।
आदि शंकराचार्य को आरोपित होने के कारण, यह महान आचार्य की कृपा वहन करता है।
दैनिक पाठ, जन्माष्टमी और कृष्ण-पूजा के लिए उत्तम।
श्री कृष्णाष्टकम् (भजे व्रजैकमण्डनम्) जप विधि
भगवान कृष्ण की प्रतिमा के समक्ष बैठें, दीप जलाएँ और आठ श्लोकों का मधुरता से पाठ करें, आंतरिक अनुप्रास को भक्ति को आगे ले जाने दें। कृष्ण की कल्पना करें जैसा प्रत्येक श्लोक वर्णन करता है — मोरपंखधारी, हाथ में बाँसुरी, गोवर्धन उठाते हुए, कुंज में नृत्य करते हुए। यह विशेष रूप से कृष्ण जन्माष्टमी पर गाया जाता है। अंतिम श्लोक के साथ समाप्त करें जो हर जन्म में कृष्ण के प्रति भक्ति की याचना करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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